Sunday, 14 August 2016

अंग्रेजों को भारी पड़ा राजा का मोर मारना

अंग्रेजों के खिलाफ दिया 'न देंगे पाई न देंगे भाई' का नारा

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अंग्रेजों  ने युद्ध्‍ा के बाद चिरगांव नरेश्‍ा राजा बख्‍ात सिंह के राजमहल काो ध्‍वस्‍त कर ‌दिया। ख्‍ांडहर पड़ा महल। 
अंग्रेजों से आजादी पाने के लिए और उनकी नीतियों के विरोध का बिगुल 1840 में ही बुंदेलख्‍ांड के चिरगांव राज्‍य नरेश राव बख्‍ात ‌सिंह ने कर दिया था। (अब यह झांसी जनपद ‌की तहसील ‌चिरगांव के नाम से जानी जाती है ) कालपी से छुट्टियां मनाने निकले अंग्रेजों को राजा की मोर का शिकार करना महंगा पड़ गया। राजा की सेना के प्रमुख वफादार सैनिक ने रानी का आदेश मिलते ही मोर को मारने वाले अंग्रेजों के सामने ही उनके सैनिक को गोलियों से भून दिया। इससे बौखलाए अंग्रेजों ने माफी स्वरूप राजा से आधा राज्य कंपनी को देने की फरमान सुनाया। अंग्रेजों की इस धमकी का जवाब राजा ने उनकी सैनिक टुकड़ी का अंतकर दिया। इसके बाद अंग्रेजों के साथ शुरू हुई मारकाट आज तक जनपद के लोग नहीं भूले हैं।



चिरगांव के पूर्व ब्लॉक प्रमुख रामनाथ मुखिया की पुस्तक ‘बुंदेलखंड के प्रथम क्रांतिकारी राव बखत सिंह’ में राजा और अंग्रेजों के मध्य हुए युद्ध का खूबसूरती से वर्णन किया गया है। घटना 1840 की है बड़ा दिन यानि 25 दिसंबर था। अवकाश के चलते अंग्रेज अफसर कुछ सैनिकों को लेकर कालपी से पिकनिक मनाने झांसी आ रहे थे। रास्ते में चिरगांव में आम के बगीचे में अफसर रुककर आराम करने लगे। इसी बीच अफसरों ने दो मोर को नाचते देखा तो मोहित हो गए। एक सैनिक ने राजा राव बखत सिंह की पली मोरों में से एक को मार दिया। मोर मरने की जानकारी होने पर राजा की सेना के प्रमुख बलदेव प्रसाद श्रीमाली भागकर पहुंचे और मोर मारने वाले अंग्रेजों से कड़े शब्दों में नाराजगी जताई। बलदेव प्रसाद के नाराजगी भरे स्वर को देखते हुए एक अंग्रेज सैनिक ने उस पर कोड़े बरसा दिए। अंग्रेजों से पिटकर वह सीधे राजमहल पहुंचे। लेकिन राजा के न मिलने पर उन्होंने मोर मारने तथा उनके साथ किये गए दुर्व्यवहार का पूरा वर्णन रानी को सुनाया।

बलदेव प्रसाद श्रीमाली के पोते श्री प्रकाश नारायण सिंह कहते हैं ‌कि अंग्रेज सैनिक द्वारा मोर मारने की सूचना पाकर रानी आग बबूला हो उठीं, उन्होंने तुरंत बलदेव से बोलीं कि तुमने बुंदेलों के नाम को ही डुबो दिया, अब जाओ और मोर मारने वाले सैनिक को मारकर आओ। रानी के शब्द सुनकर उनका खून खौल उठा, वह सीधे गए और अपनी एक ब्रिटिश सैनिक को गोली मार दी। यह देखकर अन्य सैनिकों में हड़कंप मचा गया। वह घबरा गए तथा अपने मृत साथी के शव को घोड़े पर रखकर सीधे कालपी पहुंचे तथा अफसरों को पूरा हाल सुनाया।

बिटिश सैनिक की मौत से आहत अंग्रेज अफसरों ने चिरगांव नरेश राव बखत सिंह को पत्र भेजा, जिसमें लिखा था कि तुमने मेरे एक बेकसूर सैनिक को मार दिया है, इसके दंड स्वरूप आधा राज्य ईस्ट इंडिया कंपनी को देना होगा और अपने प्राणों की रक्षा के लिए क्षमादान मांग लो। बुंदेला शासक को यह बात नागवार गुजरी। उन्होंने दरबार लगाया और मंत्री नन्नाई पांडेय ने अंग्रेजी हुकूमत का पत्र पढ़कर सुनाया तो सभी क्रोधित हो उठे। सभा में मौजूद लोगों ने कहा कि हम बुंदेली झुुकना नहीं, मरना सीखे हैं। यह बात जैसे ही कालपी पहुंची तो अंग्रेज अफसर बौखला गए। उन्होंने चिरगांव राज्य को ध्वस्त करने के लिए रणनीति बनानी शुरू कर दी। इधर, राव साहब भी समझ गए कि अंग्रेज अब किसी भी समय हमला कर सकते हैं दोनों ओर से तैयारियां होने लगीं।

15 अप्रैल 1841 को अंग्रेजों की एक टुकड़ी ने मध्य प्रदेश के बिछोंदना की पहाड़ी पर डेरा डाल लिया, जैसे ही गुप्तचरों ने यह खबर राव साहब को सुनाई तो रात में ही चिरगांव की फौज ने उन पर हमला कर दिया। इस प्रकार युद्ध लगातार चार दिन तक चले युद्ध में राव साहब के पुत्र छत्रसाल समेत बड़ी संख्या में सैनिकों ने वीरगति प्राप्त की। ऐसी हालत में चिरगांव नरेश ने तत्काल सभा बुलाई तथा निर्णय लिया गया कि अब चिरगांव छोड़ना जरूरी है। क्योंकि किला भी ध्वस्त हो गया है, वे अपनी रानी, पुत्र वधू तथा पौत्र को लेकर महल से निकल गए। अंत के कई दिनों तक राव साहब छिपते रहे बाद में हमीरपुर जनपद के पनवाड़ी के जंगल में हुई मुठभेड़ में कई ब्रिटिश सैनिकों को मारने के बाद वह वीरगति को प्राप्त हुए। आज भी उनकी समाधि पनवाड़ी में बनी हुई है।

वफादार विकलांग चौकीदार ने मारे थे पांच सौ अंग्रेज सैनिक
राजमहल छोड़ते वक्त चिरगांव नरेश राव बखत सिंह ने अपने वफादार विकलांग चौकीदार बुद्धा को साथ चलने के लिए कहा। लेकिन वह राजा पर बोझ नहीं बनना चाहता था। इसलिए जाने से इनकार कर दिया। अंग्रेजों महल में प्रवेश कर गए तो चौकीदार को बंधक बनाकर राजा और खजाने के बारे में जानकारी ली। बुद्धा ने पांच सौ अंग्रेज सैनिकों को गुमराह कर महल के अंदर बिछी बाऊद के पास खड़ा कराया और खुद की परवाह न करते हुए मौका पाकर आग लगा दी। इस कांड में वफादार बुद्धा ने राजा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। पांच सौ सैनिकों के भस्म होने की सूचना पाकर अंग्रेज अफसर पस्त हो गए।

अंग्रेजों के खिलाफ दिया 'न देंगे पाई न देंगे भाई' का नारा

आजादी की अलख जगाने झांसी के टोड़ी गांव आए थे सुभाष

देश के अमर सपूतों में झांसी जनपद के वीरों का नाम हमेशा के लिए दर्ज है। यहां के गरौठा तहसील का सिमरधा गांव अंग्रेजों का विरोध करने के लिए इतिहास में दर्ज है। द्वितीय विश्व युद्घ के दौरान जब अंग्रेजों ने युद्ध लड़ने के लिए हर घर से एक व्यक्ति और चंदा में धनराशि मांगी थी तो पूरा गांव एक जुट हो गया था तथा न तो अपने घर का सदस्य दिया था और न ही धन।

न देंगे पाई न देंगे भाई का नारा लगाकर अंग्रेजी हुकुमत को ललकारने वाले ऐतिहासिक गांव सिमरधा केे लोग आज भी अपने पूर्वजों की राष्ट्र भक्ति को याद कर गौरवान्वित हो जाते हैं। गरौठा कस्बे के रहने वाले और अमर उजाला के स्‍थानीय संवाददाता बालादीन राठौर बताते हैं कि अंग्रेजों के कहर बरपाने के वाद भी इस गांव के लोग झुके नहीं। पूरे गांव के लोगों ने एकजुट होकर आंदोलन कर दिया। जब देश आजाद हुआ तो सिमरधा को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी गांव का नाम तो दिया गया, पर दस्तावेजों में इसे दर्ज नहीं किया गया। इतना ही नहीं आजाद भारत की सरकार इन क्रांतिकारियों के सम्मान में गांव में एक स्मारक भी नहीं बना सकी। सिमरधा गांव के सभी क्रांतिकारी दिवंगत हो चुके हैं।

इनके परिवारों के लिए शासन प्रशासन ने ऐसे कोई संसाधन उपलव्ध नही कराए हैं जिससे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के परिवारों का भरण पोषण हो सके। द्वितीय विश्व युद्घ के दौरान अंग्रेज सरकार ने फरमान जारी किया था कि भारत के सभी परिवारों से एक एक व्यक्ति को जंग लड़ने के लिए ले जाएंगे तथा इसके अलावा इस परिवार से चंदा भी लिया जाएगा। अंग्रेजों के डर से जहां कई गांव के लोग आदेश मानने को मजबूर हो गए थे, लेकिन गरौठा तहसील क्षेत्र के ग्राम सिमरधा के लोगों ने अंग्रेजों के सामने झुुकने से साफ इंकार कर दिया था। 11 जनवरी 1945 को गांव के लोगों ने बैजनाथ तिवारी, शालिगराम तिवारी, गेंदालाल पटैरिया, झुडनलाल चौबे, मुन्नीलाल मिश्रा, काशी प्रसाद द्विवेदी, सीताराम त्रिपाठी, स्वामी प्रसाद राजपूत, मंगन लाल अहिरवार, रामसुमरन मिश्रा, रामसेवक रिछारिया, बाबू सिंह, विद्याधर त्रिपाठी, राजाराम शर्मा रमपुरा, प्रभुदयाल दर्जी गुढा, तीरथ राय मिश्रा, परशुराम , मूलचंद्र, सुंदर लाल, मलखान, ठाकुर दास ने पूरे गांव को एकजुट करके विरोध शुुरू कर दिया था।

सिमरधा में विरोध के स्वर उठते ही अंग्रेजों को पसीना छूट गया। यहां से चिंगारी पूरे देश में फैलने की आशंका के चलते अंग्रेजों ने इस आंदोलन का दमन करने की जिम्मेदारी तत्कालीन तहसीलदार बृजविहारी सक्सेना को दी। तहसीलदार के निर्देश पर पुलिस ने आंदोलनकारियों पर कहर बरपाना शुरू कर दिया। इस हमले से आजादी के दीवाने जख्मी तो हो गए, लेकिन झुके नहीं। तहसीलदार ने गांव के सभी जानवर अपने कब्जे में लेकर 11 क्रांतिकारियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवा दिया था। इस मुकदमे में सभी ग्रामीणों को छह साल की सजा व साढे़ सात सौ रुपये जुर्माना हुआ था। सिमरधावासियों पर हुए अत्याचार की जानकारी जैसे ही महात्मा गांधी को लगी तो वह विचलित हो गए। बापू के नेतृत्व में गांव के लोगों ने तहसीलदार बृजविहारी सक्सेना के खिलाफ मुंसिफ मजिस्ट्रेट झांसी की अदालत में मुकदमा दर्ज कराया था। बाद में देश आजाद होने के बाद इस मुकदमे में ग्रामवासियों की जीत हुई ओर तत्कालीन तहसीलदार पर दो सौ रुपये का जुर्माना हुआ था, लेकिन जब फैसला हुआ तब तक तहसीलदार का निधन हो चुका था। तत्कालीन जिलाधिकारी सतीश चंद्र मृतक तहसीलदार के बच्चों को साथ लेकर सिमरधा गांव आए और ग्रामीणों से क्षमा याचना की तो गांव के लोगों ने बच्चो के हित में जुर्माना माफ कर दिया था।



तिरंगा के लिए दे दी थी जान
आजादी की लड़ाई के हर आंदोलन में सिमरधा गांव के लोग आगे रहे। 1941 मे गांव क्रे क्रांतिकारियों ने महात्मा गांधी के आह्वान पर सत्याग्रह किया था। इस पर गांव के ग्यारह लोगों को जेल यात्रा करनी पड़ी थी। इतना ही नहीं वर्ष 1930 में सिमरधा गांव के बैजनाथ राजपूत, चन्दू रंगरेज, रज्जू रंगरेज ने मऊरानीपुर के तहसील कार्यालय में अंग्रेजी हुकुमत की आंखों में धूल झोंकते हुए तिरंगा झंडा फहरा दिया था। अंग्रेज सिपाहियों ने तीनों लोगों को पकड़कर उनकी पिटाई कर दी थी। अंग्रेजों द्वारा की गई पिटाई में रज्जू एवं चन्दू रंगरेज की मौके पर मौत हो गई थी, जबकि बैजनाथ राजूपत गंभीर रूप से घायल हो गए थे।

Saturday, 13 August 2016

आजादी की अलख जगाने झांसी के टोड़ी गांव आए थे सुभाष


 झांसी आए थे सुभाष्‍ा चंद्र बोस

देश की आजादी में झांसी जनपद का योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता है। यहां के लोगों ने 1857 के संग्राम में बढ़चढ़ कर भाग लिया। स्वंतंत्रता आंदोलन की अगुवा रही झांसी की रानी लक्ष्मीबाई को यहां के लोग देवी के समान पूजते हैं। रानी के आह्वान पर यहां के गांवों में अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल बज गया  था प्रत्येक ग्रामीण हर तरीके से अपना योगदान आजादी के लिए देने में जुट गया।

मोंठ कस्बे के रहने वाले और अमर उजाला के संवाददाता अरविंद दुबे बताते हैं कि आजादी की लड़ाई में मोंठ क्षेत्र के लोगों ने भी क्रांतिकारियों का कदम से कदम मिलाकर साथ दिया। वह बताते हैं कि कस्बे के पास का गांव टोड़ी उन दिनों स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का प्रमुख केंद्र बना हुआ था। यहां के लोगों के मन में आजादी के लिए उफान और अंग्रेजों के खिलाफ भडकी ज्वाला देखकर आजाद हिंद फौज के मुखिया सुभाष चंद्र बोस ने यहां के लोगों से मुलाकात कर बैठक की थी। उसी दौरान एक भवन तैयार किया गया था जो आज भी आजाद हिंद फौज की यादों को ताजा करता है।

सुभाष चन्द्र बोस का सानिध्य पाकर यहां के क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों से लोहा लिया। मोंठ से करीब पांच किमी दूर ग्राम टोड़ी के पास स्थित सेवरा पहाड़ पर क्रांतिकारियों का अड्डा रहा। ग्राम टोड़ी में आंदोलन से जुड़े लोगों का आना-जाना रहता था। बम बनाये जाते थे और क्रांतिकारियों को यहीं से असलहों की सप्लाई की जाती थी। क्रांतिकारियों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने वाले यहां के उन शहीदों को लोग आज भी श्रद्घा के साथ नमन करते हैं जिन्होंने आजादी के लड़ाई में क्रांतिकारियों का साथ देकर इस क्षेत्र का गौरव बढ़ाया था। मुख्य रुप से ग्राम के प्रकाश चन्द्र गुप्ता, गोवर्धनदास योगी, वृंदावन माते, मेघराज यादव क्रांतिकारियों का सहयोग करते थे।

अंग्रेजी शासनकाल में किसी स्थान पर रैली या पंचायत करने की अनुमति नहीं थी। ग्राम टोड़ी में 26 फरवरी 1940 में गांव में एक किसान पंचायत हुई थी इसमें आजाद हिन्द फौज के संस्थापक सुभाषचन्द्र बोस टोड़ी गांव आए थे और किसानों के साथ बैठक की थी। चूंकि अंग्रेज सरकार की निगाह इस किसान पंचायत पर लगी थी और सरकारी मुलाजिम पल-पल की खबर रख रहे थे, इसलिए उन्होंने गांव में एक क्रांतिकारी रखसू अहिरवार, जिसने अपनी एक हेक्टेयर जमीन उस समय पंचायत भवन के निर्माण के लिए दान में दी थी। सुभाष चन्द्र बोस के दो दिवसीय प्रवास के दौरान 27 फरवरी को रखसू अहिरवार द्वारा दी गयी जमीन पर सुभाषचन्द्र बोस ने विजयलक्ष्मी पंडित के नाम पर एक किसान भवन की नींव रखी थी, जिसे बाद में किसान पंचायत भवन के रुप में मान्यता दी गयी और उसका निर्माण कराया गया।

सुभाष चन्द्र बोस के आने के बाद अंग्रेजों ने इस क्षेत्र के लोगों पर खास नजर रखना शुरु कर दिया था। ग्रामीणों की एक-एक गतिविधियों पर नजर रखी जाने लगी थी, लेकिन क्रांतिकारियों के कदम से कदम मिलाकर चलने वाले गुमनाम शहीद प्रकाशचन्द्र गुप्ता, रखसू अहिरवार, मदनमोहन लिटोरिया, नारायण सिंह सेठ, गोवर्धनदास योगी, वृंदावन माते, मेघराज यादव ने छापा मार युद्घ जारी रखा। बम बारुद हरीलाल कुशवाहा के मकान में बनाया जाता था। बारुद और बमों को छिपाने के लिये सेवरा पहाड़ की छोटी-छोटी गुफाओं का प्रयोग किया जाता था। देश आजाद होने के बाद यहां के कुछ ही लोगों का नाम स्वतंत्रता सेनानी की सूची में आ सका। बाकी अन्य लोग जिन्होंने तन-मन-धन देश की आजादी के लिये न्यौछावर किया, वो गुमनामी के अंधेरे में चले गए।

Wednesday, 17 June 2015

किताबों में लिखे शब्द काली स्याही भर नहीं

मेरे अब तक के जीवन के आधार मेरे पिता रहे हैं वरना मैं कब की टूट कर बिखर चुकी होती। मेरा बचपन एरच में बीता, मेरे तीन भाई हैं। मेरे पिता की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने के बावजूद उन्होंने मुझे पढ़ाया। मेरे सपने पूरे करने की आजादी दी।

इंटर तक की शिक्षा गांव में पूरी की, आगे की पढ़ाई के लिए मैंने पापा से गुजारिश की, जिसे उन्होंने काफी मान-मनौव्वल के बाद स्वीकार करते हुए मेरा एडमीशन झांसी में कराया। झांसी में मौसी के घर रहकर मैंने बीएसएसी की पढ़ाई शुरू की। परीक्षा के दौरान दो पेपर देने के बाद ही मुझ पर मौसी व उनके घरवालों ने गलत आरोप ल
गाए और मेरे घर फोन कर दिया, जिस पर पापा रात के दो बजे मौसी के यहां पहुंचे। अगले दिन सुबह मेरा तीसरा पेपर था। पापा ने आगे न पढ़ने की बात कहते हुए किसी तरह पेपर देने के लिए जाने दिया। मैं पेपर के दौरान सोचती रही कि अब मेरे सपने अधूरे ही रह जाएंगे। पेपर देकर वापस आई। किसी ने मेरी नहीं सुनी। लेकिन अगर आप सच्चे हैं तो भगवान आपकी मदद करता है। इसी तरह मेरे दूर की चाची की बहन जो पारीछा में रहती हैं, जिनसें मैं कभी पहले नहीं मिली थी, मेरे लिए भगवान बन गईं, उन्होंने मुझे अपने यहां रखकर बीएससी फर्स्ट ईयर की पढ़ाई पूरी कराई।

मेरी गलती न होने की बात पता चलने पर पापा ने झांसी में किराए पर कमरा दिलाते हुए दादी के साथ रहने और पढ़ाई पूरी करने को कहा। झांसी में रहने के दौरान पापा को गांव के व अन्य लोगों ने काफी भला-बुरा कहा। बोले कि बेटी की पढ़ाई में पैसा बर्बाद कर रहा। कुछ लोगों ने मुझ पर गलत आरोप लगाए, लेकिन मेरे पापा ने किसी की बात नहीं सुनी। मेरे शिक्षकों ने भी मेरा साथ दिया। इससे मेरा मन मजबूत हुआ। इस बीच बीएससी सेकेंड ईयर पूरा कर लिया और कंप्यूटर सीखने लगी, पापा ने पढ़ाई की लगन देख मुझे लैपटॉप दिलाया। दादा ने पेंशन के पैसे मेरी पढ़ाई के लिए दिए। उनके कांपते हाथों से पैसे लेना आज भी मुझे रुला देता है। लैपटॉप मिलने से पढ़ाई का मेरा छोटा आंगन बड़ा हो गया। इस बीच बीएससी पूरी कर ली। पापा ने हौसला बढ़ाया तो बी-लिब किया, अभी एमलिब कर रही हूं। बीटीसी का फॉर्म भी डाला है, लेकिन अब तक कॉलेज न मिलने से मायूस हूं। कई सारे फॉर्म भरे हैं, मेहनत करती रहूंगी, कभी न कभी तो सफलता मिलेगी ही। असफलता के बारे सोचकर मैं पीछे नहीं हट सकती।

वर्तमान में चंद्रशेखर आजाद इंस्टीट्यट ऑफ साइंस टेक्नोलॉजी से एमलिब कर रही हूं। मेरा सपना है कि टीचर या लाइब्रेरियन बनकर लोगों को शिक्षित क रूं और उन्हें बता सकूं कि  किताबों में लिखे शब्द बस काली स्याही भर नहीं हैं। कुछ महीने पहले आईआईएमआर के झांसी सेंटर में प्रवेश लेना चाहा, लेकिन उसकी फीस अधिक होने से मन मसोस कर रह गई। झांसी में रहने का कोई ठिकाना नहीं रहा। कई ऐसी घटनाएं हुईं जिनसे घबराकर पापा ने घर से ही पढ़ाई करने को कहा है। लेकिन गांव से आगे बढ़ने के दरवाजे सीमित हो गए हैं। फिर भी मेरा प्रयास अंत तक जारी रहेगा।

मेरे घरवालों को मेरी शादी की चिंता सताने लगी है। सबको मेरी नौकरी लगने का इंतजार है। पापा सोचते हैं कि मेरी नौकरी के बाद उन पर शादी के खर्च का बोझ कम हो जाएगा, साथ ही मेरा अच्छे परिवार में रिश्ता होगा। मैं चाहती हूं कि मेरी जहां भी शादी हो, बस वो लोग पढ़े- लिखे हों, मुझे आगे पढ़ने का मौका दें, मैं अपनी शिक्षा से अन्य लोगों को शिक्षित करना चाहती हूं। मैं किसी भी कीमत में हार नहीं मानूंगी। मेरे घरवालों को मुझसे बहुत उम्मीदें हैं मैं उनकी उम्मीदों को पूरा करना चाहती हूं और मुझ पर गलत आरोप लगाने वाले और बेटियों को गलत समझने वाले लोगों के मुंह बंद करना चाहती हूं।

मैं सिर्फ अपने लिए पढ़कर नौकरी नहीं हासिल करना चाहती, बल्कि मैं उन सभी मां- बाप को दिखाना चाहती हूं जो समझते हैं कि बेटियां सिर्फ पराया धन हैं, उन्हें उच्च शिक्षा दिलाना बेकार है। मेरी पढ़ाई में सहयोग करने वाले किसी भी शख्स का मैं चेहरा नहीं भूल सकती। मैं सफल होकर उन सबका शुक्रिया अदा करूंगी और हर पहलू पर उनका साथ दूंगी। करिअर के मुकाम तक अभी नहीं पहुंच सकी हूं, इसके लिए संघर्ष जारी रहेगा।

मेरी सफलता की कहानी-
पूजा सोनी, एरच, झांसी उत्‍तर प्रदेश्‍ा
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नोट- अमर उजाला के बेटी ही बचाएगी अभियान के लिए पूजा साोनी द्वारा कागज पर लिख कर भेजी गई आत्मकथा को लेख्‍ाक ने बेहतर शब्द देकर उसे निख्‍ाारने की कोशिश की है जिसे अमर उजाला ने 22 अप्रैल के झांसी संस्‍करण्‍ा में प्रकाशित कर प्रोत्साहित किया है।
साभ्‍ाार- अमर उजाला

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