Sunday, 24 May 2015

तेरे गुम होने का दर्द

क्या आपका अभी तक कुछ गुम हुआ है? फॉर एग्जांपल, दिल, पैसे, मोबाइल, मार्कशीट या रूम, अलमारी, ऑफिस, ड्रॉर की चाबी। और इनमें से किसके गुम होने का सबसे ज्यादा अफसोस हुआ या होता है?
यही सवाल मैनें अपने एक मित्र महोदय से किया। आंसर के तौर पर वे तपाक से बोले दिल गुम हुआ है, जो आज तक नहीं मि
ला। मैंने टेढ़ी निगाह से महोदय को घूरा और बोला अमां मियां जब दिल गुम हो चुका है तो तुम्हारे शरीर में जान क्यों बाकी है? खून पंप होना बंद क्यों नहीं हुआ? तुम मरे क्यों नहीं? अब मित्र महोदय की बोलती बंद, सें‌टियाने लगे।

मैं जान गया, दिल कहीं गुम नहीं होता, हम जबरदस्ती खुद को उसके गुम होने का अहसास कराते हैं, लेकिन आखिर तक वह अहसास हमें होता नहीं। क्योंकि वो सच नहीं होता।

मेरे एक और मित्र महोदय हैं, मैनें भी उनसे यही सवाल दागा। वे काफी रोनी सूरत में बोले भाईजान काफी दिन पहले मेरे पचास हजार रुपए गुम हुए हैं, जो आज तक नहीं मिले। महोदय के हाथ में एक लाल कलर की चमकीली बैग थी। मैंने पूछा इसमें क्या है? तो काफी ना-नुकु र के बाद बताया कि उसमें कुछ-एक लाख रुपए हैं। मैनें कहा, तो फिर गुम कहां हुए वो तो आपके पास ही हैं। बस दुगुने होने के लिए आपसे विदा हुए थ्ो।
कुछ देर मन मशक्कत करता रहा कि इतने में हमारे गंवइले चचा भिटा गए। अब मैनंे उनसे भी यही सवाल ठोंक दिया। वे तो जैसे ताव में आ गए, सांप की भांति फुंफकारते हुए बोले, अरे ससुरा हमरा मोबाइल गुम हुआ है। उसमें ससुर उस लौंडे का नंबर सेव किये रहे हम, जो हमरी बिटेना का मिस काल करके परेशान करत रहा। मैंने मन ही मन सोचा कि इनकी बिटेना तो कल ही गांव की बाजार वाली गली में पड़ोसी लौंडे से बतिया रही थी। खबर है दोनों का चक्कर भी चलता है।
मुझे सही जवाब मिलने की जगह, लोगों के गम की अलग-अलग वजहें मिलीं।
दरअसल कौन सी वस्तु के गुम होने से आपको दुख-अफसोस होगा। यह पूरी तरह आपकी कंडीशंस पर और उस वस्तु की इंपार्टेंस पर डिपेंड करता है।
कुछ ऐसे समझिए 'जरूरी कुछ भी नहीं और जरूरी सबकुछ है।’
कल शाम की ही बात है। आफिस से वापस आते समय रास्ते में कहीं मेरा चाबी का गुच्छा जेब को बिना इत्तिला किए या यूं मान लें कि उससे सांठ-गांठ साध कहीं सरक लिया। गुच्छा खुद तो गया ही अपने साथ आफिस ड्रॉर, रूम और अलमारी की चाबियों को भी बरगला ले गया।
अब मुझे अफसोस के साथ ग्लानि, तकलीफ और बेचैनी हो रही है। यह बेचैनी कब तक रहेगी? शायद आज रात तक, सुबह तक या पूरे दिन तक। लेकिन एक समय खत्म हो ही जाएगी। क्योंकि समय ही सब विपत्तियों और सुखों का जिम्मेदार होता है, और यह ‌िककिसी के लिए भ्‍ाी नहीं रुकता।

तेरे गुम होने का दर्द


तेरे गुम होने का दर्द


क्या आपका अभी तक कुछ गुम हुआ है? फॉर एग्जांपल, दिल, पैसे, मोबाइल, मार्कशीट या रूम, अलमारी, ऑफिस, ड्रॉर की चाबी। और इनमें से किसके गुम होने का सबसे ज्यादा अफसोस हुआ या होता है?
यही सवाल मैनें अपने एक मित्र महोदय से किया। आंसर के तौर पर वे तपाक से बोले दिल गुम हुआ है, जो आज तक नहीं मि
ला। मैंने टेढ़ी निगाह से महोदय को घूरा और बोला अमां मियां जब दिल गुम हो चुका है तो तुम्हारे शरीर में जान क्यों बाकी है? खून पंप होना बंद क्यों नहीं हुआ? तुम मरे क्यों नहीं? अब मित्र महोदय की बोलती बंद, सें‌टियाने लगे।

मैं जान गया, दिल कहीं गुम नहीं होता, हम जबरदस्ती खुद को उसके गुम होने का अहसास कराते हैं, लेकिन आखिर तक वह अहसास हमें होता नहीं। क्योंकि वो सच नहीं होता।

मेरे एक और मित्र महोदय हैं, मैनें भी उनसे यही सवाल दागा। वे काफी रोनी सूरत में बोले भाईजान काफी दिन पहले मेरे पचास हजार रुपए गुम हुए हैं, जो आज तक नहीं मिले। महोदय के हाथ में एक लाल कलर की चमकीली बैग थी। मैंने पूछा इसमें क्या है? तो काफी ना-नुकु र के बाद बताया कि उसमें कुछ-एक लाख रुपए हैं। मैनें कहा, तो फिर गुम कहां हुए वो तो आपके पास ही हैं। बस दुगुने होने के लिए आपसे विदा हुए थ्ो।
कुछ देर मन मशक्कत करता रहा कि इतने में हमारे गंवइले चचा भिटा गए। अब मैनंे उनसे भी यही सवाल ठोंक दिया। वे तो जैसे ताव में आ गए, सांप की भांति फुंफकारते हुए बोले, अरे ससुरा हमरा मोबाइल गुम हुआ है। उसमें ससुर उस लौंडे का नंबर सेव किये रहे हम, जो हमरी बिटेना का मिस काल करके परेशान करत रहा। मैंने मन ही मन सोचा कि इनकी बिटेना तो कल ही गांव की बाजार वाली गली में पड़ोसी लौंडे से बतिया रही थी। खबर है दोनों का चक्कर भी चलता है।
मुझे सही जवाब मिलने की जगह, लोगों के गम की अलग-अलग वजहें मिलीं।
दरअसल कौन सी वस्तु के गुम होने से आपको दुख-अफसोस होगा। यह पूरी तरह आपकी कंडीशंस पर और उस वस्तु की इंपार्टेंस पर डिपेंड करता है।
कुछ ऐसे समझिए 'जरूरी कुछ भी नहीं और जरूरी सबकुछ है।’
कल शाम की ही बात है। आफिस से वापस आते समय रास्ते में कहीं मेरा चाबी का गुच्छा जेब को बिना इत्तिला किए या यूं मान लें कि उससे सांठ-गांठ साध कहीं सरक लिया। गुच्छा खुद तो गया ही अपने साथ आफिस ड्रॉर, रूम और अलमारी की चाबियों को भी बरगला ले गया।
अब मुझे अफसोस के साथ ग्लानि, तकलीफ और बेचैनी हो रही है। यह बेचैनी कब तक रहेगी? शायद आज रात तक, सुबह तक या पूरे दिन तक। लेकिन एक समय खत्म हो ही जाएगी। क्योंकि समय ही सब विपत्तियों और सुखों का जिम्मेदार होता है, और यह ‌िककिसी के लिए भ्‍ाी नहीं रुकता।

Friday, 1 August 2014

कई हजार ईसा पूर्व पैदा हुये अजूबे

विश्व के प्राचीन अजूबे


दुनिया बहुत सुन्दर है। प्रकृति ने अपने रंग से इस दुनियां को बहुत ही रंगीन बनाया है। समुद्र, पहाड़ और जमीन के मिलन से प्रकृति ने कुछ ऐसा नजारा हमारे लिए तैयार किया है जिसकी कल्पना करना इंसान के लिए कभी-कभी सपने जैसा हो जाता है। दुनिया में प्रकृति ने इतना रंग घोला है कि इंसान में भी इसे और सुन्दर बनाने की ललक पैदा हो गई। कभी अपनी याद के लिए तो कभी कला को समर्पण करने के लिए तो कभी किसी अन्य वजह से इंसान ने ऐसी कई रचनाएं की हैं जिनसे यह दुनिया और भी खूबसूरत बन गई है।
संसार में यूं तो इंसान द्बारा बनाई गई हजारों ऐसी कृतियां हैं जिन्हें देख आप अंचभे में पड़ जाएंगे लेकिन दुनिया के सात अजूबों की बात ही अलग है। अपनी शिल्प कला, वास्तु कला और भवन निर्माण कला के लिए दुनिया के सात अजूबे हमेशा चर्चा का विषय बने रहते हैं। आज बात कुछ प्राचीन एवं कई हजार ईसा पूर्व बूढ़े हो चुके अजूबों के बारे में।

 

मिस्र के पिरामिड 

मिस्र के पिरामिड दुनिया के प्राचीन सात अजूबों में एकमात्र सुरक्षित मिस्र के पिरामिडों का निर्माण आज से लगभग पांच हजार वर्ष पूर्व हुआ था। वास्तव में, ये पिरामिड मिस्र के शासकों के मकबरे हैं। सबसे बड़ा पिरामिड काहिरा से कुछ दूर गीजा कस्बे में स्थित है। यह राजा पैरोखूफू और उसकी रानी का मकबरा है। 481 फुट ऊंचे इस मकबरे के वर्गाकार आधार की प्रत्येक दीवार की लंबाई 75० फुट के लगभग है। इसमें बीस लाख से अधिक शिलाखंड हैं। माना जाता है कि दो हजार से भी अधिक मजदूरों ने बीस वर्षो तक कार्य करके इसे तैयार किया था।

मासोलस का मकबरा

संसार का तीसरा अजूबा हेलीकारनासस के शासक मासोलस का मकबरा था, जिसका निर्माण उसकी पत्नी ने करवाया था. यह लगभग सौ फुट ऊंचा था और उसके ऊपर घोड़े जुते रथ पर राजा-रानी की मूर्तियां थीं। निर्माण के कुछ ही दिनों बाद सकिदर महान के आक्रमण के कारण यह मकबरा ध्वस्त हो गया। राजा-रानी की मूर्तियां आज भी ब्रिटिश संग्रहालय में सुरक्षित हैं।

देवी डायना का मंदिर

विश्व का चौथा अजूबा एफसेस में देवी डायना का मंदिर था। आठ फुट ऊंचे खम्भों पर टिके छत वाले इस मंदिर का निर्माण ईसा से साढ़े तीन सौ वर्ष पूर्व टर्की में हुआ था। इस समय यह मंदिर बहुत पवित्र माना जाता था। लोग इसमें अपना धन एवं कीमती वस्तुएं रखकर निश्चिंत हो जाते थे। 262 ई. में गोथ्स ने इस मंदिर को जला डाला था।

हीजियोस की कांस्य प्रतिमा

दुनिया का पांचवां अजूबा हीजियोस की कांस्य प्रतिमा थी। जो लगभग सौ फुट ऊंची थी। यह रोड्स द्बीप में थी। इसका निर्माण ईसा से 28० वर्ष पूर्व हुआ था। निर्माण के 56 वर्ष बाद यह प्रतिमा भूकंप में नष्ट हो गयी। जीयस देवता की मूर्ति संसार का छठा अजूबा ओलम्पिया में स्थित जीयस देवता की मूर्ति थी। इसे प्रसिद्ध शिल्पकार फीडिसस ने ईसा से साढ़े चार सौर वर्ष पूर्व बनाया था। चालीस फुट ऊंची इस मूर्ति के कपड़े सोने के थे। शरीर हाथी दांत का बना था। मूर्ति की आंखें कीमती हीरों से बनी थीं। इस मंदिर को ईसाइयों ने नष्ट कर दिया था।

फैरोह का प्रकाश स्तंभ 

दुनिया का सातवां अजूबा सकिदरिया के बंदरगाह के पास एक द्बीप पर बना फैरों का प्रकाश स्तम्भ था। सफेद संगमरमर से बना यह प्रकाश स्तंभ छह सौ फुट ऊंचा था। इसका निर्माण ईसा से 283 वर्ष पूर्व हुआ था। यह प्रकाश स्तंभ डेढ़ हजार वर्षों तक ठीक हालत में रहा, उसके बाद भूकंप में नष्ट हो गया।





 

Sunday, 13 April 2014

दुनिया का सबसे बड़ा होटल

दस हजार कमरों वाला दुनिया का सबसे बड़ा होटल

यूं तो पूरे विश्व में कई अजब-गजब इमारतें हैं, लेकिन जर्मनी में बाल्टिक सागर के आइलैंड में स्थित होटल प्रोरा अपने आप में एक अजूबा है। इस होटल में तकरीबन दस हजार कमरे हैं। इतने कमरों वाला होटल पूरी दुनिया में कहीं नहीं है। आपको आश्चर्य होगा कि दुनिया का सबसे विशाल होटल पिछले 7० सालों से वीरान पड़ा है।
जर्मनी के नाजी शासन ने इस विशाल होटल दा प्रोरा का निर्माण 1936 से 1939 के बीच में करवाया था। इसे बनाने में 9,००० लेबरफोर्स को तीन साल लगे थे।
 
होटल प्रोरा में एक समान 8 बिल्डिंग बनाई गई हैं और हर बिल्डिंग की लंबाई 4.5 किलोमीटर है। यह बिल्डिंग समुद्र से बमुश्किल 15० मीटर दूर है। इसमें चार एक जैसे रिसॉर्ट थे, सभी में सिनेमा, फेस्टिवल हॉल और स्वीमिग पूल भी थे।
जर्मन तानाशाह एडोल्फ हिटलर का यह प्लान बहुत महत्वाकांक्षी था। वह एक घुमावदार सी रिसॉर्ट बनाना चाहता था, जो विश्व में सबसे विशाल हो। इस होटल के हर कमरे में दो बेड, एक अलमारी और एक सिक बनाया गया है। हर फ्लोर में टॉयलेट्स, शॉवर और सामूहिक बॉथरूम बनाए गए थे। बिल्डिंग के मध्य में यह व्यवस्था की गई थी कि युद्धकाल में इसे अस्पताल में बदला जा सके।
 
हिटलर का यह महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट पूरा होता, इससे पहले ही द्बितीय विश्वयुद्ध शुरू हो गया। विश्वयुद्ध खत्म होने के बाद पूर्वी जर्मनी के विस्थापितों को इस होटल में रखा गया था। इसके बाद जर्मनी ने इसका उपयोग एक मिलिट्री पोस्ट के लिए किया।
आज भी यह बिल्डिंग काफी खूबसूरत लेकिन वीरान है। हालांकि इसके कुछ ब्लॉकों को छोड़कर बाकी खंडहर हो गए हैं। 


2०11 में इसके एक ब्लॉक में 4०० बिस्तरों वाला अस्पताल बनाया गया। अभी होटल प्रोरा को 3०० बिस्तरों वाले एक हॉलीडे रिसॉर्ट में बदलने की तैयारी चल रही है। इसमें नए सिरे से टेनिस कोर्ट, स्वीमिग पूल और शॉपिग सेंटर और हर वो चीज बनाई जानी प्रस्तावित है, जिससे यह अद्भुत स्थलों में शुमार हो सके।
 

Saturday, 12 April 2014

मुहब्बत


डिब्बे का दर्द

तुम्हारे जाने के बाद से ही
खुद को डिब्बा बना लिया

उस डिब्बे में रखकर यादें सारी
मैंने खुद को डुबो लिया

अधूरा खत लगता है सब
इसकी स्याही खुद को बना दिया

बारिश में चलता हूं जब-जब
तुझमें तब-तब खुद को घुला दिया

बूंदे तो पसंद थी बेपनाह तुझे
मैने बारिश में घर बना लिया

जहां छोड़ा था तुमने उस दिन
अब वहां से हिलना ही छोड़ दिया

तुम तो जमी रही पत्थर बनके
पत्थर में लोगों ने मुझे भी घुसा दिया

आते हैं लोग फूल डालने कब्र पे तुम्हारी
भूलकर मेरी कब्र पे डालना शुरू किया

 

Tuesday, 8 April 2014

बेल का खेल


बेल का अजब खेल

बेल का पेड़ विश्व के कई हिस्सों में पाया जाता है। भारत में इस वृक्ष का पीपल, नीम, आम और पलाश वृक्षों के समान ही बहुत अधिक सम्मान है। हिंदू धर्म में बेल का वृक्ष भगवान शिव की अराधना का मुख्य अंग है। बेल की तासीर बहुत शीतल होती है। गर्मी की तपिश से बचने के लिए इसके फल का शर्बत बड़ा ही लाभकारी होता है। इसके फल व पत्तियों मंे टैनिन, आयरन, कैल्शियम, पोटेशियम और मैग्नेशियम जैसे रसायन पाए जाते हैं।
मान्यता है कि शिव को बेल-पत्र चढ़ाने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। बिल्व के पेड़ का भी विशिष्ट धार्मिक महत्व है। कहते हैं कि इस पेड़ को सींचने से सब तीर्थों का फल और शिवलोक की प्राप्ति होती है।
बेल का वृक्ष यूं तो पूरे भारत में पाया जाता है लेकिन विशेष रूप से हिमालय की तराई, सूखे पहाड़ी क्षेत्रों में चार हजार फीट की ऊंचाई तक यह पाया जाता है। मध्य व दक्षिण भारत में बेल वृक्ष जंगल के रूप में फैले हुए हैं और बड़ी संख्या में उगते हैं। यह भारत के अलावा दक्षिणी नेपाल, श्रीलंका, म्यांमार, पाकिस्तान, बांग्लादेश, वियतनाम, लाओस, कंबोडिया एवं थाईलैंड में उगते हैं। इसकी खेती भारत के साथ श्रीलंका, उत्तरी मलय प्रायद्बीप, जावा एवं फिलीपींस तथा फीजी द्बीपसमूह में भी की जाती है।
 
यह पंद्रह से तीस फुट ऊं चा होता है। इसका कड़ा और चिकना फल कवच कच्ची अवस्था में हरे रंग और पकने पर सुनहरे पीले रंग का हो जाता है। कवच तोड़ने पर पीले रंग का सुगंधित मीठा गूदा निकलता है, जो खाने और शर्बत बनाने के काम आता है।

आयुर्वेद में बेल वृक्ष को कई प्रकार से लाभकारी बताया गया है। इसके पत्तों, फलों को औषधि के रूप में बहुत प्रयोग किया जाता है। बेल की जड़ों की छाल का काढ़ा मलेरिया व अन्य बुखारों में हितकर होता है। अजीर्ण में बेल की पत्तियों का रस काली मिर्च और सेंधा नमक में मिलाकर पीने से आराम मिलता है। अतिसार के पतले दस्तों में ठंडे पानी से इसका चूर्ण लेने पर आराम होता है। आंखें दुखने पर बेल के पत्तों का रस, स्वच्छ पतले वस्त्र से छानकर एक-दो बूंद आंखों में टपकाने से समस्या से निजात मिलती है। शरीर की त्वचा के जलने पर बेल के चूर्ण को गरम कर तेल में मिलाकर जले अंग पर लगाने से आराम मिलता है।
 

Sunday, 6 April 2014

याद शहर का मीठा खत


 

तुमसे मिलने की आस में


बात ज्यादा पुरानी नहीं है। कानपुर में बाकी सब की तरह मैं भी पड़ाई और सलीके से जिंदगी जीना सीख रहा हूं। जब भी फु र्सत मिलती है तो यहां की रंगीनियों को करीब से देखने का मौका नहीं छोड़ता। दोस्तों के साथ कम अकसर अकेला ही बड़ा चौराहा पर स्थित जेड स्क्वायर मॉल और कभी-कभी रेव थ्री पहुंच जाता हूं।

दरअसल यहां की चकाचौंध में वेस्टर्न कल्चर के साथ देसी तड़का भी लगा रहता है, जिसमें खुद को खो देने की पूरी कोशिश करता हूं, लेकिन सच तो ये है कि अब यहां अकेले आना अच्छा नहीं लगता। अकसर यहां आकर खाली पड़ी रिलेक्सिंग चेयर्स पर बैठ जाया करता हूं। आज भी बैठा हूं और खुद को लोगों की नजरों में बिजी दिखाने के लिए मोबाइल की स्क्रीन को बेवजह बार-बार खोल-बंद कर रहा हूं।

...हेलो डियर.र.र...
आवाज ठीक मेरे सामने से आई थी। मैनें चौंककर मोबाइल से सिर उठाते हुए देखा कि सामने करीब पचपन-साठ साल के सफे द फ्रेंच कट दाढ़ी चेहरे पर समेटे सज्जन खड़े थे । मुझे उन्हें पहचानने में देर न लगी। वह सज्जन कोई और नहीं बल्कि कानपुर फिल्म सोसाइटी के चेयरमैन और वहीं के फेमस डिग्री कॉलेज के इतिहास विभाग के अध्यक्ष डॉ. एस.पी. सिंह थे ।

मैनें कौतूहलवश व सकुचाते हुए डॉ. सिंह को इवनिंग विश किया। उन्होंने जवाब देते हुए, इस तरह अकेले बैठने का कारण जानना चाहा और दोस्तों के बिना मॉल में आने की वजह जानने में जिज्ञासा दिखाई। दोस्तों के होने न होने पर सवाल दाग दिया। मैनें 'होते तो साथ आते’ चार अक्षरों का घालमेल जवाब देते हुए खुद को चुप कर लिया।

थोड़ी देर कुछ सोचते हुए उन्होंने सच्चे दोस्तों की परिभाषा बताई और जिंदगीे में कम से कम पांच दोस्तों का होना अनिवार्य बताकर, छाती के बराबर अंदर की ओर खुलने वाली कोट की जेब में हाथ डालकर दो पेज का एक पेपर निकाल कर मेरे हाथ में थमा दिया।
वह दो पेज का पेपर एकदम कड़क और बेहद सलीके से मोड़ा व रखा गया मालूम हो रहा था। वह दो पेज का पेपर काली स्याही के सुनहरे अक्षरों से सना था। वह बेहद जबरदस्त था और उसमें लिखे शब्दों का कोई जोड़ नहीं था। ये मुझे उसे पढ़ने के बाद पता चला।

क्या था डॉ. सिंह के उन दो पेजों के पेपर में??
नीचे विस्तृत तौर पर उल्लेख कर रहा हूं।

डॉ. सिंह द्बारा दिए गए उस दो पेज के पेपर को 'यादों का आर्इना’, 'निस्वार्थ दोस्ती की कहानी’, 'रिश्तों की सुगबुगाहट’ कह लूं या फिर उसे 'मीठा खत’ कहूं, मेरे लिए डिसाइड करना मुश्किल हो रहा था।
खैर 'मीठा खत’ कुछ इस प्रकार था।

दिन बीत रहे हैं यादों में, फिर वो बीते दिन फिल्म के फ्लैशबैक की तरह सामने आ रहे हैं। जब हम वाकई साथ थ्ो। जेबें खाली होने के बाद भी साथ फिल्में देखने का मौका और पैसा जुटा लेते थ्ो। आज जेबों में उतने पैसे पड़े रहते हैं, जितने उस समय कल्पना में भी नहीं थे   ।

पर समय? साथ? बीते दिनों के धुंधलकों में कही खो गए हैं। कुछ सवाल हैं, जो अपना जवाब चाहते हैं, पर कारणों की कसौटी पर कुछ भी ऐसा नहीं कि जो समझा कर उसे शांत कर सकूं। इन्हीं बातों की वजह से आज सालों बाद तुम्हें कुछ लिखने का फैसला किया है।

मोबाइल के की-पैड और कंप्यूटर के की-बोर्ड पर नाचती अंगुलियों में वो मजा नहीं आता जो 25 पैसे के उस पोस्ट कार्ड में था। पर अब समय बदल चुका है, और तुम भी।
तब लिखना इतना मुश्किल भी नहीं था, लाइफ में इतने कांप्लीकेशन नहीं थे !
आज भी पानी बरस रहा है। पानी की बूंदों की टप-टप वो दिन याद दिला रही है, जब हम बस के गेट पर लटक कर भीगते हुए सारे शहर का चक्कर लगाते थे । वो समोसे याद हैं, महाराणा कॉलेज के गेट के ठीक सामने वाले? आज फिर मन हो रहा है, खाने का। मगर अब बस का गेट नहीं है और हम भीग भी नहीं सकते, बीमार होने का डर है ना। सुना है वहां अब समोसे भी वैसे नहीं रह गए, ठीक हमारी दोस्ती की तरह।

वो स्कूल की दीवारें हमें कभी मिलने से नहीं रोक पाईं, मैं हमेशा तुम्हारे साथ बंक मारकर वहीं पहुंच जाता, जहां साइकिलें हमारा इंतजार करती थीं और फिर शहर का कोई भी सिनेमा हाल हमारी पहुंच से दूर नहीं होता था।
दोस्ती के रिश्तों की वो गर्मी कहां गई ? जब जाड़े में बगैर स्वेटर पहने तुमसे मिलने निकल पड़ता था। कितनी दीवारें फांद लेते थे हम। आज दूसरों के द्बारा झूठ बोलकर बनाई गई नफरत की दीवारें नहीं लांघ पा रहे हैं।


जिंदगी ने हमारे पैदा होते ही ज्यादातर रिश्ते हमें बने-बनाए दिए और उसमें अपनी च्वाइस का कोई मतलब था ही नहीं। तुमसे हुई एक दोस्ती ही ऐसी थी, जिसे मैनें खुद बनाया था। फिर दोस्ती की नहीं जाती, वो तो बस हो जाती है।

कॉलेज और हमारी पढ़ाई का मिजाज बदला, लेकिन हम नहीं बदले, जो बदल जाएं वो हम कहां। तब किसी ने कहा था, रिश्ते हमेशा एक जैसे नहीं रहते, तब कैसे हमने मजाक उड़ाया था उसका। ये नहीं जानते थे कि जिंदगी की राहों में दौड़ते-दौड़ते कब हम अपना मजाक खुद बना बैठेंगे।

तुम हमेशा कहते थे कि जिंदगी जब सिखाती है, अच्छा ही सिखाती है। जिंदगी ने सिखाया तो, पर बड़ी देर से। कंप्टीशन की इस रेस में कब हम एक-दूसरे के ही कंप्टीटर बन गए पता ही नहीं चला। आज ऑफिस का टारगेट सोते-जागते कानों में गूंजता रहता है। साल दर साल पूरा भी होता है, लेकिन एक-दूसरे से मिलने की हसरत कहां गुम हो गई इसकी तलाश है।

इतने पुराने रिलेशन में कुछ शेयर करने जैसा था ही नहीं, सबकुछ इतना स्वाभाविक था कि न मुझे कुछ बोलना पड़ता न तुम्हें कुछ समझना। पर दोस्त जीवन में सबकुछ पा लेने की चाह में हम कब अजनबी बन गए पता ही नहीं चला। तुमने तो अपने आपको साइलेंस के परदे में लपेट लिया और मेरी बोलती बंद हो गई।

अगले हफ्ते एक अच्छी फिल्म रिलीज होने वाली है, उसके टिकिट बुक कर रहा हूं। तुम्हारा इंतजार करूंगा। मुझे उम्मीद है तुम जरूर आओगे, मुझसे मिलने और एक बार फिर पुराने-हसीन लम्हों को याद करने और उन्हें अमलीजामा पहनाने।

तुम्हारा मुकुल श्रीवास्तव.............।।


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