Monday, 30 July 2018

मौत के मकां















मौत के मकां, खूब हैं यहां
देख लो देख लो खूब गौर से
आ रहे लोग यहां दूर दूर से
न है किसी को पता न किसी को खबर
कितनी रेत डाली है कितनी छोड़ी डगर
बिल्डर ने सारे नियम तोड़ डाले हैं
सीमेंट सरिया हल्की डाली, कच्चे ईंट डाले हैं
हम गए हम गए तुम भी पहुंच गए
बातों में आके बिल्डर को नोट दे दिए
सोच न सके कुछ भी सोच न सके
हमने एक लिया प्लॉट तुमने दो लिये

प्लॉट के नाम पे फ्लैट दे दिया
बुरे फंसे बुरे फंसे हमको ठग लिया
मन मसोसकर फिर रहने चले गए
मकां सजा दिए पूजा भी कर दिए
रह रहे थे हम तो खूब शान से
अपने अपने घर में जो आलीशान थे
फिर नज़र लगी किसी कि दिन काला हो गया
जोर का शोर हुआ और गुबार छा गया
चारों ओर चारों ओर हर कोई रो पड़ा
आलीशां आलीशां मकां मेरा ढह गया

मौत आई मौत आई रूह कांप गई
गृहस्थी उजड़ गई ज़िन्दगी बिखर गई
भीड़ आई लोग आए जमघट भी लग गया
देखते देखते सपना वो थम गया
कुछ मरे कुछ दबे कुछ मिले भी नहीं
देखिए आज तो रोशनी भी काली हो गई
सब बिलख बिलख गये मुलाज़िम आ गया
पांच पांच लाख का ऐलान कर गया
मौत सस्ती देख के दिल ये रो गया
हाय हाय हाय क्या से क्या हो गया
जान गई माल गया वज़ूद भी चला गया
वो देखो वो देखो बिल्डर तो हंस रहा।

- रिज़वान नूर खान

Wednesday, 18 July 2018

रो रहीं बुंदेलखंड की ऐतिहासिक धरोहरें

झांसी स्थित राजा रघुनाथ राव का महल।

बुंदेलखंड के पांच जिलों में मौजूद 51 ऐतिहासिक स्मारकों के रखरखाव की स्थिति बदतर है। इन स्मारकों की सुरक्षा, देखभाल और संरक्षण के लिए
सरकार प्रतिवर्ष मात्र डेढ लाख रुपये इस मद में जारी करती है। इनके रखरखाव के लिए मात्र तीन कर्मचारी तैनात हैं। ऐसे में आप अंदाजा लगा सकते हैं कि ये कर्मचारी किस तरह अलग अलग जिलों में स्थापित ऐतिहासिक धरोहरों का संरक्षण करते होंगे।

रानी लक्ष्मीबाई की नगरी झांसी में सर्वाधिक धरोहरें हैं। इसके बाद चित्रकूट, ललितपुर, बांदा और जालौन में हैं। इस वर्ष पर्यटन मंत्रालय ने 51 स्मारकों की संख्या में बढ़ोत्तरी की है। ऐतिहासिक धरोंहरों-स्मारकों की सूची में इस बार 20 नाम और जोड़े गए हैं। यह एक तरह से अच्छा है लेकिन इनके संरक्षण के लिए मंत्रालय बजट बढ़ाना भूल गया है। अभी तक 51 स्मारकों के लिए ही यह रकम ऊंट के मुंह में जीरा साबित हो रही थी। अब स्मारकों की संख्या बढ़ाए जाने से हालात और बद्तर हो जाएंगे।
झांसी स्थित रघुनाथ राव महल के अंदर की तस्वीर।

जानकार बताते हैं कि पर्यटन की ओर केंद्र और राज्य सरकार झुकाव ज्यादा है नहीं। यही वजह है कि स्मरकों की संख्या में इजाफा जरूर किया गया लेकिन राशि नहीं बढ़ाई गई। पुरातत्व विभाग के जिम्मे यह स्मारक लगातार अपना अस्तित्व खोते जा रहे हैं। स्मारकों का सौंदर्यीकरण लंबे समय से नहीं किया गया है। ये जर्जर और खंडहर में तब्दील होते जा रहे हैं। यहां लोगों ने कब्जा कर निर्माण करा लिए हैं तो दीवारों की इंटें घिसती जा रही हैं। वहीं, दीवारों और छतों पर की गई शानदार नक्काशी मिटती जा रही है। झाड़-झंखार और गंदगी से परिसर पूरी तरह पटे हुए हैं।

वीरांगना लक्ष्मीबाई की नगरी झांसी में झांसी किला, रानीमहल, रघुनाथ राव महल और झोकनबाग सिमेट्री प्रमुख हैं। इन स्मारकों का निर्माण बुंदेलों और अग्रेजों के शासनकाल में किया गया है। राज्य पुरातत्व विभाग ने रानी महल  और झोकनबाग सिमेट्री को केंद्रीय पुरातत्व विभाग ने 1964 और 1978 में अपने संरक्षण में लिया था। इसके अलावा रघुनाथ राव महल को सन 2002 में संरक्षित धरोंहरों की सूची में शामिल किया गया। गौरवमयी यादें समेटे ये धरोहरें अतिक्रमण और गंदगी के चलते अस्तित्व खोती जा रही हैं। पुरातत्व  विभाग नगर निगम के पाले में गेंद डाल खुद को पाक साफ बताता है जबकि नगर निगम पुरातत्व अधिकारियों को इसके लिए जिम्मेदार मानता है।

वीरांगना लक्ष्मीबाई के रानी महल की पहली मंजिल का द्रश्य।
झांसी में पुरातत्व विभाग के अधिकारी एके दुबे बताते हैं कि लोगों के प्रदर्शन और मांग और विभाग के बार बार प्रस्ताव भेजने के बाद इस बार रघुनाथ राव महल के लिए शासन से 50 हजार रुपये अलग से जारी किए गए हैं। वे बताते हैं कि इस राशि की मदद से महल के चारों ओर कटीले तारों की फेसिंग कराएंगे ताकि अराजक तत्वों का आनाजाना बंद हो जाए। लेकिन रानी महल समेत अन्य स्मारकों के लिए कोई बजट अलग से जारी नहीं करना सरकार के उदासीन रवैये को जाहिर करता है।

डेढ़ लाख की रकम से सिर्फ झांसी जनपद के स्मारकों का संरक्षण ही नहीं हो पाता है तो ललितपुर, चित्रकूट, बांदा और जालौन के ऐतिहासिक स्मारकों के संरक्षण का क्या होगा। वर्तमान में कई स्मारक खंडहर में तब्दील हो चुके हैं तो कई जमींदोज होने की कगार पर पहुंच चुके हैं। पर्यटन और पुरातत्व विभाग जिला प्रशासन और नगर निगम पर अपनी जिम्मेदारी डाल रहा है जबकि ये दोनों पर्यटन और पुरातत्व विभाग को इस स्थिति के लिए जिम्मेदार बताते हैं। कुछ भी हो अगर इन स्मारकों के लिए जल्द और धनराशि जारी नहीं की गई तो आने वाले कुछ वर्षों में हम इन्हें सिर्फ किताबों में ही पढ़ सकेंगे। 

Monday, 16 July 2018

दुनिया की सबसे खतरनाक जेल ग्यातारामा


हाल ही बागपत जेल में कुख्यात माफिया मुन्ना बजरंगी की ताबड़तोड़ गोलियां मारकर हत्या कर दी गई। इससे पहले भी ऐसे कई मामले हो चुके हैं। जेल में हत्या हो जाना कोई नई बात नहीं है। दुनिया भर में ऐसा होता आया है। हालांकि, ऐसे मामलों के लिए मानवाधिकार आयोग और कानून बेहद सख्त है। अफ्रीका की रवांडा में रोज करीब दस कैदियों की हत्या कर दी जाती है। हालात ऐसे हैं कि मानवाधिकार आयोग और वैश्विक संगठन में ऐसा होने से नहीं रोक पा रहे हैं।

अपराधियों को दंड देने के लिए जेल में बंद करने की प्रथा जमाने पुरानी है। यूं तो दुनिया में बहुत सी जेलें ऐसी हैं जिन्हें खतरनाक माना जाता है। किन, अफ्रीका के रवांडा प्रांत के किगाली में स्थित ग्यातारामा जेल को दुनिया का नरक कहा जाता है। यहां हर दिन मौत तांडव करती है। जानकारों के मुताबिक यहां जो भी कैदी गया जिंदा अपने घर नहीं लौट सका। इस जेल मौत का रोज का आना जाना रहता है।

माना जाता है कि ग्यातारामा जेल बनने से पहले किगाली इलाके में दो जातियों के बीच वर्चस्व को लेकर लड़ाई शुरू हुई जो बाद में भयंकर हो गई। दोनों समुदायों के लोग एक-दूसरे के लोगों को मारने-काटने लगे। कई सालों तक यही हालात बने रहे। सरकार ने गृहयुद्ध के हालात काबू करने के लिए सेना को मैदान में उतार दिया। सेना ने दोनों समुदायों के खूंखार हत्यारों को कैद कर लिया। इन्हें बंद करने के लिए ग्यातारामा जेल का निर्माण कराया गया। जेल में भी दोनो समुदायों के लोग एक-दूसरे की हत्या से बाज नहीं आए। जो सिलसिला अभी भी जारी है।

जेल का माहौल इतना खतरनाक है कि यहां के कैदी अपने साथियों को ही मारकर खा जाते हैं। इसीलिए इस जेल को धरती का नरक भी कहा जाता है। क्षमता से अधिक कैदी होने के कारण यहां रात में सोने के लिए भी मारकाट करनी पड़ती है। एक हजार कैदी रखने की क्षमता वाली इस जेल में सात हजार कैदियों को बंद किया गया है। ऐसे में रात के समय बैरक में पैर रखने और खड़े रहने तक की जगह नहीं बचती है। नींद उसी को मिल पाती है जो सामने वाले को मार डालता है।


ऐसे हालात में यहां के कैदी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं। रोजमर्रा की चीजें पाने के लिए यहां मौत का खेल खेला जाता है। आंकड़ों के मुताबिक इस जेल में हर रोज कम से कम दस कैदियों की मौत होती है। इनमें से ज्यादातर की हत्या की गई होती है। यहां कैदियों से जानवरों से भी बदतर व्यवहार किया जाता है। यहां आने वाला कैदी कभी जिंदा वापस नहीं लौटता। इन हालातों को सुधारने के लिए वैश्विक मानवाधिकार आयोग और अन्य संगठन लगातार काम कर रहे हैं लेकिन स्थितियों में सुधार नहीं हो सका है। फिर भी यहां के कैदियों में जेल से रिहा होने की उम्मीद बाकी है।

Wednesday, 27 June 2018

बाबा जयशंकर की पंचायत


मन्दाकिनी के तट पर रमणीक भवन में स्कन्द और गणेश अपने-अपने वाहनों पर टहल रहे हैं। नारद भगवान् ने अपनी वीणा को कलह-राग में बजाते-बजाते उस कानन को पवित्र किया, अभिवादन के उपरान्त स्कन्द, गणेश और नारद में वार्ता होने लगी।

नारद-(स्कन्द से) आप बुद्धि-स्वामी गणेश के साथ रहते हैं, यह अच्छी बात है, (फिर गणेश से) और देव-सेनापति कुमार के साथ घूमते हैं, इससे (तोंद दिखाकर) आपका भी कल्याण ही है।

गणेश-क्या आप मुझे स्थूल समझकर ऐसा कह रहे हैं? आप नहीं जानते, हमने इसीलिए मूषक-वाहन रखा है, जिसमें देव-समाज में वाहन न होने की निन्दा कोई न करे, और नहीं तो बेचारा 'मूस' चलेगा कितना? मैं तो चल-फिर कर काम चला लेता हूँ। देखिये, जब जननी ने द्वारपाल का कार्यमुझे सौंप रखा था, तब मैंने कितना पराक्रम दिखाया था, प्रमथ गणों को अपनी पद-मर्यादा हमारे सोंटे की चोट से भूल जाना पड़ा। 

स्कन्द-बस रहने दो, यदि हम तुम्हें अपने साथ न टहलाते, तो भारत के आलसियों की तरह तुम भी हो जाते। गणेश-(हँसकर) ह-ह-ह-ह, नारदजी! देखते हैं न आप? लड़ाके लोगों से बुद्धि उतनी ही समीप रहतीहै, जितनी की हिमालय से दक्षिणी समुद्र!

स्कन्द-और यह भी सुना है।-ढोल के भीतर पोल! गणेश-अच्छा तो नारद ही इस बात का निर्णय करेंगे कि कौन बड़ा है। नारद-भाई, मैं तो नहीं निर्णय करूँगा; पर, आप लोगों के लिए एक पंचायत करवा दूँगा, जिसमें आप ही निर्णय हो जायगा। इतना कहकर नारदजी चलते बने।

वटवृक्ष-तल सुखासीन शंकर के सामने नारद हाथ जोड़कर खड़े हैं। दयानिधि शंकर ने हँसकर पूछा-क्यों वत्स नारद! आज अपना कुछ नित्य कार्य किया या नहीं?'' नारद ने विनीत होकर कहा-नाथ, वह कौन कार्य है?'' जननी ने हँसकर कहा-वही कलह-कार्य।नारद-माता! आप भी ऐसा कहेंगी, तो नारद हो चुके; यह तो लोग समझते ही नहीं कि यह महामाया ही की माया है, बस, हमारा नाम कलह-प्रिय रख दिया है। महामाया सुनकर हँसने लगीं।
शंकर-(हँसकर)-कहो, आज का क्या समाचार है? 
नारद-और क्या, अभी तो आप यों ही मुझे कलहकारी समझे हुए बैठे हैं, मैं कुछ कहूँगा, तो कहेंगे कि बस तुम्हीं ने सब किया है। मैं जाता तो हूँ झगड़ा छुड़ाने, पर, लोग मुझी को कहते हैं।
शंकर-नहीं, नहीं, तुम निर्भय होकर कहो।
नारद-आज कुमार से और गणेशजी से डण्डेबाजी हो चुकी थी। मैंने कहा-आप लोग ठहर जाइए, मैं पंचायत करके आप लोगों का कलह दूर कर दूँगा। इस पर वे लोग मान गये हैं। अब आप शीघ्र उन लोगों के पञ्च बनकर उनका निबटारा कीजिए।
शंकर-यहाँ तक! अच्छा, झगड़ा किस बात का है?
नारद-यही कि देवसेना-पति होने से कुमार अपने को बड़ा समझते हैं, और (जननी की ओर देखकर) बुद्धिमान होने से गणेश अपने को बड़ा समझते हैं।
जननी-हाँ-हाँ, ठीक ही तो है, गणेश बड़ा बुद्धिमान है।
शंकर ने देखा कि यह तो यहाँ भी कलह उत्पन्न किया चाहता है, इसलिए वे बोले-वत्स! तुम इसमें अपने पिता को ही पञ्च मानो, कारण कि जिसको हम बड़ा कहेंगे, दूसरा समझेगा कि पिता नेहमारा अनादर किया है-अस्तु, तुम शीघ्र ही इसका आयोजन करके दोनों को शान्त करो। नारद ने देखा कि, यहाँ दाल नहीं गलती, तो जगत्पिता के चरण-रज लेकर बिदा हुए।
नारद अपने पिता ब्रह्मा के पास पहुँचे। उन्होंने सब हाल सुनकर कहा-वत्स! तुझे क्या पड़ी रहती है, जो तू लड़ाई-झगड़ों में अग्रगामी बना रहता है, और व्यर्थ अपवाद सुनता है?
नारद-पिता! आप तो केवल संसार को बनाना जानते हैं, यह नहीं जानते कि संसार में कार्य किस प्रकार से चलता है। यदि दो-चार को लड़ाओ न, और उनका निबटारा न करो, तो फिर कौन पूछताहै? देखिए, इसी से देव-समाज में नारद-नारद हो रहा है, और किसी भी अपने पुत्र की आपने देव-समाज में इतनी चर्चा सुनी है?
ब्रह्मा-तो क्या तुझे प्रसिद्धि का यही मार्ग मिला है?
नारद-मुझे तो इसमें सुख मिलता है- ''येन केन प्रकारेण प्रसिद्ध: पुरुषो भवेत् ।''
ब्रह्मा-अब तो शंकर की आज्ञा हुई है, जैसे-तैसे इसको करना ही होगा, किन्तु हम देखते हैं कि गणेशजी जननी को प्रिय हैं; अतएव यदि उनकी कुछ भी निचाई होगी, तो जननी दूसरी बात समझेंगी! अस्तु! अब कोई ऐसा उपाय करना होगा कि जिसमें बुद्धि से जो जीते, वही विजयी हो।अच्छा, अब सबको शंकर के समीप इकठ्ठा करो। नारद यह सुनकर प्रणाम करके चले।
विशाल वटवृक्षतले सब देवताओं से सुशोभित शंकर विराजमान हैं। पंचायत जम रही है। ब्रह्माजी कुछ सोचकर बोले-गणेशजी और कुमार में इस बात का झगड़ा हुआ है कि कौन बड़ा है? अस्तु, हम यह कहते हैं कि जो इन लोगों में से समग्र विश्व की परिक्रमा करके पहले आवेगा, वही बड़ा होगा। स्कन्द ने सोचा-चलो अच्छी भई, गणेश स्वयं तुन्दिल हैं-मूषक-वाहन पर कहाँ तक दौड़ेंगे, और मोर पर मैं शीघ्र ही पृथ्वी की परिक्रमा कर आऊँगा। फिर वह मोर पर सवार होकर दौड़े। गणेश ने सोचा कि भव और भवानी ही तो पिता-माता हैं, अब उनसे बढक़र कौन विश्व होगा। अस्तु, यह विचारकर शीघ्र ही जगज्जनक, जननी की परिक्रमा करके बैठ गये।

जब कुमार जल्दी-जल्दी घूमकर आये, तो देखा, तुन्दिलजी अपने स्थान पर बैठे हैं। ब्रह्मा ने कहा-देखो, गणेशजी आपके पहले घूमकर आ गये हैं! स्कन्द ने क्रोधित होकर कहा-सो कैसे? मैंने तो पथ में इन्हें कहीं नहीं देखा!
ब्रह्मा ने कहा-क्या मार्ग में मूषक का पद-चिह्न आपको कहीं नहीं दिखाई पड़ा था?

स्कन्द ने कहा-हाँ, पद-चिह्न तो देखा था।
ब्रह्मा ने कहा-उन्होंने विश्वरूप जगज्जनक, जननी ही की परिक्रमा कर ली है। सो भी तुम्हारे पहले ही।
स्कन्द लज्जित होकर चुप हो रहे।

Sunday, 10 June 2018

बुंदेलखंड का सूखा

बुंदेलखंड हमेशा से कम बारिश वाला इलाका रहा है, लेकिन 2002 से लगातार सूखे ने मर्ज़ को तकरीबन लाइलाज बना दिया है.यह जमीनी बताती है कि बुंदेलखंड को ईमानदार कोशिशों की ज़रूरत है. साफ-सुथरी सरकारी मशीनरी अगर आम लोगों को साथ लेकर कोशिश करे तो सूखता जा रहा बुंदेलखंड शायद फिर जी उठे।


दिल्ली के पास वैशाली में तकरीबन नियमित रूप से एक रिक्शेवालेचेतराम से मेरी मुलाकात होती है जो अमूमन सफ़ेद कमीज़ और पाजामे में होता है। वही चेतराम मुझे एक रोज़ अपने घर के असबाब के साथ सड़क पर खड़ा मिल गया। उसकी झुग्गी उजाड़ दी गई थी। आनंद विहार, दिल्ली की सरहद है और एक सड़क इस केंद्रशासित प्रदेश को उत्तर प्रदेश से अलग करती है। इसी सड़क से थोड़ा और आगे जाएंगे तो वैशाली और इंदिरापुरम जैसी पॉशकॉलोनियां हैं।

वैशाली में, जहां मैं रहता हूं, आसपास अभी अनगिनत खाली प्लॉट हैं, जिनपर न जाने कितने लोग झुग्गियां बनाकर रहते हैं। वहां महागुनमेट्रो और शॉप्रिक्स जैसे चमचमाते मॉल्स हैं, जहां की दुनिया में पॉपकॉर्न जैसी चीज़ें मक्खन के साथ खाई जाती हैं, उससे थोड़ा आगे ही करोड़ों की कीमत वाले खाली प्लॉट्स पर झुग्गियों में न जाने कितनी ज़िंदगियां अपने अरबों-खरबों के सपनों को जीने लिए जाने कहां-कहां से आती हैं।

चेतराम भी उन्हीं में से एक हैं, जो उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड से पलायन करने को मजबूर हुए हैं। बिरादरी से दलित चेतराम पेट पालने के चक्कर में घर छोड़कर यहां किसी और की ज़मीन पर रहते हैं, जहां उनकी झुग्गी अवैध और गंदी बस्ती के रूप में गिनी जाती है।

ऐसी ही किसी गिनती को कम करने के लिए गाज़ियाबाद विकास प्राधिकरण ने सभी खाली प्लॉटवालों को अपने प्लॉट पर निर्माण कार्य शुरू कराने का आदेश दिया, ऐसा न करने पर आवंटन रद्द कर दिया जाता। इसीलिए, चेतराम की झुग्गी उजाड़ दी गई। झुग्गी ही नहीं उजड़ी, उनका घर और उनकी दुनिया भी उजड़ गई। अब चेतराम और उसके गांव के उसके ही जैसे लोग, मकनपुर गांव में रहते हैं। वहां भी वो किसी खाली ज़मीन पर ही रहते हैं, जहां रोज़मर्रा की दिक्कतें हैं। पानी की, शौच की, सफ़ाई की, हर क़िस्म की दिक़्क़त।

चेतराम, बुंदेलखंड के अपने गांव गन्हौली से निकले तो अपने पीछे सात बीघा ज़मीन छोड़कर आए थे। वे बड़े शान से बताते हैं कि उनका इलाका बेमिसाल राजाओं का इलाक़ा रहा है। राजा परमार देव का ज़िक्र करते हुए चेतराम कहते हैं-बड़े लड़इयामहुबे वाले, इनकी मार सही न जाए। ठीक है कि इतिहास में महोबे के वीरों की मार बहुत भारी थी और उन्हें हराना कठिन था लेकिन आज की तारीख़ में पानी ने सबको त्रस्त करके रख दिया है।

चेतराम के इलाक़े में एक के बाद कई एक बरसों तक नियमति बारिश नहीं होने से खेती फ़ायदे का सौदा नहीं रह गया। सात बीघा ज़मीन को बटाई पर लगाकर, काम की तलाश में चेतराम सपरिवार दिल्ली आ गए। बटाई वाली ज़मीन से कुछ मिलता नहीं। दिल्ली में वे ख़ून-पसीना बहाते हुए रिक्शा चलाते हैं। लेकिन उनकी आंखों में गांव वापस जाने का सपना और उम्मीद भी ज़िंदा है।

केन नदी के किनारे ज़िंदगी उम्मीद के सहारे आगे बढ़ती है। शायद इसी ने ज़िंदा रखा था, गढ़ा गांव के प्रह्लाद सिंह को। बड़ी-बड़ी शानदार मूंछों वाले प्रह्लाद सिंह ने अपनी जवानी में किसी का क़त्ल कर दिया था। क़त्ल का जुर्म अदालत में साबित हो गया, 1962 में बांदा ज़िला अदालत ने उन्हें सज़ा-ए-मौत सुनाई। लेकिन, प्रह्लाद सिंह को राष्ट्रपति से जीवनदान मिला और उनकी सज़ा आजीवन कारावास में बदल दी गई।

प्रह्लाद सिंह ने दस साल जेल में काटे थे कि सन बहत्तर में नेकचलनी की वजह से उन्हें वक़्त से पहले रिहा कर दिया गया। प्रह्लाद, गांव लौटे तो नई उम्मीद के साथ ज़िंदगी को दोबारा पटरी पर लाने की कोशिश की। गृहस्थी की गाड़ी चल निकली। अभी एक दशक पहले तक सब कुछ ठीक-ठाक था। लेकिन परिवार बड़ा हुआ तो प्रह्लाद सिंह और उनके भाई ने मिलकर ट्रैक्टर के लिए बैंक से कर्ज़ ले लिया। इसी कर्ज़ ने उनके परिवार को बरबाद कर दिया।

Thursday, 5 April 2018

भारत बंद

दलित आंदोलन के पीछे का सच


सोमवार को पूरे देश में दलित संगठनों की ओर से बुलाए गए भारत बंद के दौरान हुई हिंसा में अब तक दस लोगों की जान जा चुकी है। हिंसा में बदला दलित आंदोलन देश के उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, बिहार, झारखंड, राजस्थान, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र समेत करीब 20 राज्यों में फैल चुका है। क्या आप जानते हैं कि भारत बंद या दलित आंदोलन के पीछे की असली वजह क्या है। क्यूं यह मुद्दा इतना गरमा गया है। अगर नहीं जानते तो हम आपको बताते हैं।


दरअसल, बीते 20 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश में एससी/एसटी एक्ट के दुरुपयोग पर चिंता जताई थी और इसके तहत मामलों में तुरंत गिरफ़्तारी की बजाय शुरुआती जांच की बात कही थी। यहां बता दें कि एससी/एसटी (प्रिवेंशन ऑफ़ एट्रोसिटीज़) एक्ट अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों को अत्याचार और भेदभाव से बचाने वाला क़ानून है। इसके तहत कोई भी ऊंची जाति-बिरादरी या कोई भी व्यक्ति दलितों का अपमान नहीं कर सकता है। जातिसूचक शब्दों का प्रयोग नहीं कर सकता है। ऐसा करने पर इस एक्ट के तहत भारी दंड का प्रावधान है।

20 मार्च को आए सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से इस क़ानून का डर कम होने और नतीज़तन दलितों के प्रति भेदभाव और उत्पीड़न के मामले बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। ये जानना भी ज़रूरी है कि आख़िर सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा फ़ैसला क्यों दिया और ये क्यों कहा कि एससी/एसटी एक्ट का बेज़ा इस्तेमाल हो रहा है।

इस मामले की कहानी शुरू होती है महाराष्ट्र के सतारा ज़िले के गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ़ फ़ार्मेसी, कराड से। इस कॉलेज के स्टोरकीपर भास्कर करभारी गायकवाड़ की सालाना गोपनीय रिपोर्ट में उनके ख़िलाफ़ निगेटिव कॉमेंट्स किए गए। एससी/एसटी समुदाय से ताल्लुक रखने वाले भाष्कर के ख़िलाफ़ ये कॉमेंट्स उनके आला अधिकारी डॉक्टर सतीश भिसे और डॉक्टर किशोर बुराडे ने किए थे जो इस वर्ग से नहीं आते थे। सतीश भिसे और किशोर बुराडे की रिपोर्ट के मुताबिक़ भास्कर अपना काम ठीक से नहीं करते थे और उनका चरित्र ठीक नहीं था।

खुद पर ऐसी टिप्पणी किए जाने से नाराज भाष्कर ने आपत्ति जताई और 4 जनवरी 2006 को सतीश भिसे और किशोर बुराडे के ख़िलाफ़ कराड पुलिस थाने में एफ़आईआर दर्ज कराई। भास्कर ने 28 मार्च 2016 को इस मामले में एक और एफ़आईआर दर्ज कराई जिसमें सतीश भिसे और किशोर बुराडे के अलावा उनकी शिकायत पर कार्रवाई न करने वाले दूसरे अधिकारियों को भी नामजद किया गया। एससी/एसटी एक्ट के तहत आरोपों की जद में आए अधिकारियों का कहना था कि उन्होंने अपनी आधिकारिक क्षमता में अपने अच्छे विवेक का इस्तेमाल करते हुए ये प्रशासनिक फ़ैसले लिए थे। किसी स्टाफ़ की सालाना गोपनीय रिपोर्ट में उसके ख़िलाफ़ निगेटिव कॉमेंट्स अपराध नहीं कहे जा सकते, भले ही उनका आदेश ग़लत ही क्यों न हो।

आरोपित अधिकारियों ने यह भी कहा कि अगर एससी/एसटी एक्ट के तहत दर्ज मामले खारिज़ नहीं किए जाते तो अनुसूचित जाति और जनजाति से ताल्लुक रखने वाले स्टाफ़ की सालाना गोपनीय रिपोर्ट में सही तरीके से भी निगेटिव कॉमेंट्स दर्ज कराना मुश्किल हो जाएगा। इससे प्रशासन के लिए दिक्कत बढ़ जाएगी और वैध तरीके से भी सरकारी काम करना बेहद मुश्किल हो जाएगा।


इस मामले की सुनवाई के बाद 20 मार्च 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश में इस एससी/एसटी एक्ट के दुरुपयोग पर चिंता जताई थी और इसके तहत मामलों में तुरंत गिरफ़्तारी की बजाय शुरुआती जांच की बात कही थी। जानकारों का कहना है कि एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट की आपत्ति करने से सरकार को इस कानून में बदलाव करने का मौका मिल गया। ऐसे में दलितों को चिंता सताने लगी कि उनके अधिकारों और न्याय की रक्षा करने वाला यह कानून बदल गया तो ऊंची जाति या धनवान व्यक्ति उनका शोषण करने लगेंगे। कानून में संशोधन में न हो इसके लिए दलित संगठनों ने सोमवार को पूरे देश में भारत बंद का ऐलान किया था। दलितों का यह आंदोलन हिंसा की भेंट चढ़ गया।

भारत बंद की अपील करने वाले अनुसूचित जाति-जनजाति संगठनों के अखिल भारतीय महासंघ के राष्ट्रीय प्रधान महासचिव केपी चौधरी ने बताया कि इस एक्ट (क़ानून) से दलित समाज का बचाव होता था। दलितों पर अत्याचार करने वालों के लिए यह एक्ट एससी-एसटी एक्ट चाबुक की तरह काम कर रहा था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से परिस्थितियां उलट होने की संभावना बन गई है। ऐसे में इस वर्ग का प्रत्येक व्यक्ति दुखी और आहत है और ख़ुद को पूरी तरह से असुरक्षित महसूस कर रहा है।

जस्टिस एके गोयल और जस्टिस यूयू ललित की खंडपीठ के फ़ैसले पर पुनर्विचार के लिए केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को याचिका दायर कर दी है। हालांकि अब ये सुप्रीम कोर्ट पर निर्भर करता है कि उसका क्या रुख होता है।

इनपुट: बीबीसी से

Monday, 18 December 2017

महान क्रांतिकारी चे ग्वेरा का अंतिम पत्र



9 अक्टुबर,1967 को बोलिविया में अर्नेस्टो चे ग्वेरा की हत्या कर दी गई। इस काम को अमेरिकी ग्रीन बेरेट से प्रशिक्षण हासिल करने वाले बोलिविया के सैनिक और सीआईए एजेंटों ने अंजाम दिया। चे के सम्मान में हम चे की ओर से फिदेल कास्त्रो को लिखे मशहूर फेयरवेल लेटर को पब्लिश कर रहे हैं। इस पत्र को 3 अक्टुबर, 1965 को फिदेल कास्त्रो ने चे की पत्नी और बच्चों की उपस्थिति में टेलीविजन पर पढ़ा था।


फिदेल,
इस वक्त मुझे कई लम्हे याद आ रहे हैं। मारिया एंटोनिया के घर पर आपसे मिलना और फिर मुझे क्यूबा आने का आपका निमंत्रण.. उसके बाद तैयारियों से जुड़े तनाव के क्षण, आज वो सब मेरे स्मृति पटल पर नांच रहे हैं।

एक दिन पूछा गया था कि हमें मृत्यु के लिए किसे जिम्मेदार मानना चाहिए। इस सवाल के जवाब में जब हम तथ्यों के तह में गए तो वास्तविकता ने हम सबको प्रभावित किया। हमने अच्छी तरह समझा कि सच्चा क्रांतिकारी वही है जो मृत्यु को गले लगाता है, और क्रान्ति में वही जीतता है या मृत्यु को प्राप्त होता है, यदि वह वास्तविक है। कई साथी विजय-मार्ग पर वीर-गति को प्राप्त हुए।

आज प्रत्येक वस्तु कम नाटकीय लगती है क्योंकि अब हम पहले से ज्यादा परिपक्व हैं। लेकिन तथ्य दोहराए जा रहे हैं। मैं अनुभव करता हूं कि मैं अपने कर्तव्य के उस हिस्से को पूरा कर चुका हूं, जिसने मुझे क्यूबाई क्रांति से उसी के क्षेत्र में बांध रखा था और अब मैं आपसे, अपने साथियों से, अपने लोगों से जो कि मेरे भी अपने सगे हैं, सभी से विदा लेता हूं।

मैं पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व में अपनी स्थिति, मंत्री और मेजर का पद और अपनी क्यूबाई नागरिकता को त्यागने की घोषणा करता हूं। अब कोई विधि नियम मुझे क्यूबा से नहीं बांधता। अब केवल वे ही बंधन हैं जो दूसरी प्रकृति के हैं और जो तोड़े नहीं जा सकते है बाकी पदों को तो तोड़ा और छोडा जा सकता है।

अपने अतीत को याद करते हुए मेरा विश्वास है कि मैने जहां तक संभव हुआ गौरव और निष्ठा के साथ क्रांतिकारी विजयों को संगठति करने में भरपूर योगदान किया है। मेरी गंभीर असफलता यही थी कि सारी माइस्त्रा की शुरुआती मुलाकात में मैने आप पर विश्वास नहीं किया था। मै नेता तथा क्रांतिकारी के रुप में आपके गुणों को तत्काल नहीं समझ पाया।

मैंने एक शानदार जीवन बिताया है । आपके साथ उस गौरव का अनुभव किया है जो कैरीबियन संकट के समय हमारी जनता के उन शानदार लेकिन तनावपूर्ण दिनों से जुड़ी है। आप जैसे तेज बुद्धि वाले राजनीतिज्ञ बहुत कम हैं। मुझे इस बात पर नाज है कि मैं बेहिचक आपके पदचिन्हों पर चला। आपकी चिंतनपद्धति को अपनाया और खतरों तथा सिद्धान्तों के विषय में आपके दृष्टिकोण को वास्तविक रुप में समझा।

संसार के अन्य राष्ट्र भी मुझसे ऐसे ही नम्र प्रयत्नों की मांग कर रहे हैं । मैं उस कार्य को करना चाहता हुं,जो क्यूबा के प्रधान होने के उत्तरदायित्व के कारण आपके लिए निषिद्ध हैं। और अब समय आ गया है जब हमें एक दूसरे से विदा ले लेनी चाहिए।

मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि मैं यह सब प्रसन्नता और दुख के मिलेजुले भावों के साथ कर रहा हूं। मैं यहां अपने सृजक की पवित्रतम आशाओं और प्रियजनों को छोड़ रहा हूं। मैं उस जनता को छोड़ रहा हूं,जिसने अपने पुत्र की तरह मेरा स्वागत किया । इस बात से मुझे गहरी पीडा हो रही है। मैं संघर्ष के अग्रिम स्थलों में उस विश्वास को ले जा रहा हूं,जो मैनें आपसे सीखा। जहां कहीं भी हो—मैं साम्राज्यवाद के विरुद्ध लडने के लिए अपनी जनता के अदम्य क्रांतिकारी उत्साह और पवित्र कर्तव्य भावना को अपने साथ ले जा रहा हूं। यह सोचकर मुझे प्रसन्न्ता होती है और विछोह की गहरी पीडा को झेलने का साहस भी मिलता है।

मैं एक बार फिर से घोषित करता हूं कि मैने क्यूबा को अपने उत्तरदायित्व से मुक्त कर दिया है। केवल एक बात को छोडकर जो उसके उदाहरण से ही पैदा होती है। यदि मेरा अंतिम क्षण मुझे किसी और आकाश के नीचे पाता है तो अंतिम विचार इस जनता और खास तौर पर आपके संबंध में होगा। मैं आपकी शिक्षा और आपके उदाहरण के लिए कृतज्ञ हूं और अपने कार्यों के अंतिम परिणामों को लेकर विश्वासपात्र बनने का प्रयास करता रहूंगा।

मैं क्रातिं के लिए विदेशी नीति से जुड़ा माना जाता हूं। और मैं उसे जारी रखूंगा। मैं जहां भी रहूंगा एक क्यूबाई क्रांतिकारी के उत्तरदायित्व को अनुभव करता रहूंगा और उसी के मुताबिक व्यवहार करुंगा। मुझे इस बात का कोई मलाल नहीं है कि मैं अपने बच्चों और पत्नी के लिए कोई संपति नहीं छोड रहा हूं। मुझे खुशी है कि ऐसा हुआ। मैं उनके लिए कोई मांग नहीं करता,क्योंकि मैं जानता हूं कि उनके जरूरी खर्च और शिक्षा की व्यवस्था राज्य करेगा।

मैं आपसे और अपनी जनता से बहुत कुछ कहना चाहूंगा। लेकिन मुझे लगता है कि यह सब अनावश्यक है। मैं जो कुछ कहना चाहता हूं,शब्द उसे अभिव्यक्त करने में असमर्थ हैं और मैं नहीं सोचता कि बेकार की मुहावरेबाजी का कोई मूल्य है।

सदा विजय के मार्ग पर ! या तो देश या मौत!

पूरे क्रांतिकारी भावना के साथ मैं आपको गले लगाता हूं

-चे
अप्रैल,1965

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