Sunday, 23 September 2018

मुल्क













कोई बता दे मुल्क का ये हाल क्यूं है
हरी-भरी ज़मीं आखिर लाल क्यूं है
महंगाई पर कब तक रोयेंगे हम
सीमा पर कब तक लाल खोएंगे हम।

महंगाई की ये शक्ल अजीब सी है
बात सिर्फ तेल और रुपये की नहीं है
बदल रहा है फ़िज़ा-ओ-मंज़र मुल्क का
शहीद की मां इसबार रोई नहीं है।

देश में झूठों का नया अभ्यारण्य खुला है
रेडियो पे सुनो सरहद पे फिर सैनिक मरा है
कुछ एंकर हिन्दू-मुस्लिम में उलझा के रखे हैं
उनसे कोई पूछ ले, क्या ईमान अभी ज़िंदा है ?

- रिज़वान नूर खान

Thursday, 13 September 2018

मुर्गे की दावत


गांव के बदलते स्वरूप को आलेख रूपी छोटी-छोटी यादों को समेटे रामधारी सिंह दिवाकर की 'जहां आपनो गांव' किताब हाल ही में साहित्य संसद प्रकाशन दिल्ली से छपकर आई है। किताब में बिहार के अररिया ज़िलें के गांवों का ज़िक्र किया गया है। वहां के हालातों, मजदूरों की मुश्किलों और उनके आधुनिक होने के साथ ही गांव-देहात की अच्छी-बुरी बातों का वर्णन है।

लेखक ने किताब की दूसरी कहानी में हनीफ चाचा को केंद्र में रखा है। हनीफ बुजुर्ग हैं, उनका कोई पक्का रोजगार नहीं है। एक तरह से मजदूर ही हैं। करीब तीन बीवियां और 18 बच्चों का कुनबा है। इसके अलावा कई मुर्गियां और बकरियां हैं। परिवार की जीविका मुश्किल से चलती है। मुर्गे-बकरियों की वजह से आये-दिन पड़ोसियों से कहासुनी होती है। कई बार मारपीट और ख़ूनमखून भी हो चुका है। जबकि कई लोगों से उनकी अच्छी पटती भी है।

हनीफ चाचा का मुर्गा सुबह से नहीं मिल रहा, अब शाम हो गई है। हनीफ और बाकी लोग जानते हैं कि मुर्गा पड़ोसी बनिये ने खुंदक निकलने के लिए पकड़कर छुपा लिया है। हितैषियों के कहने पर हनीफ चाचा थाने में शिकायत करने पहुंचे हैं। दरोगा ने चाचा को सुना, तम्बाकू थूकी और लार टपकाती आंखों से इशारा कर रुपये मांगे। चाचा बनिये को पिटवाना और मुर्गे को वापस पाना चाहते हैं तो कुर्ते की जेब से 20 का नोट निकालकर दे दिया।

बनिये को थाने में दांत-डपट के बाद चार-छै डंडे पड़े तो मुर्गा लाकर दरोगा को सौंप दिया। हनीफ चाचा को अब तसल्ली है। बनिये की बेइज्जती हो गई। थाने से छोड़ने के नाम पर दरोगा और दलालों को जेबें भी गरम हो गईं। तमाशा देखने वालों का मनोरंजन हो गया। हनीफ चाचा मुर्गा लेकर जाने लगे तो दरोगा ने घुड़क दिया और उसे काट-छीलकर लाने को कहा। शाम को थाने में मुर्गे की दावत उड़ी।

इस लड़ाई में न हनीफ चाचा को कुछ हासिल हुआ और न बनिये को कुछ मिला। बल्कि दूसरे-तीसरे लोग मलाई काट गए। करीब दो दशक पुरानी इस घटना ने आज और विस्तार पा लिया है। घूसखोरी और एक-दूसरे से जलने-कुढ़ने की आदत का कैनवास पहले कहीं ज्यादा बड़ा हो गया है।

लेखक रामधारी सिंह दिवाकर कई किताबें, कहानियां लिख चुके हैं। अररिया ज़िले के नरपतगंज गांव के रहने वाले हैं। मिथिला विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष पद से रिटायर हैं। उनकी यह किताब अभी पूरी पढ़ी नहीं है। पढ़ रहा हूं पर अभी तक जितनी पढ़ी है उससे कह सकता हूं कि किताब 'जहां आपनो गांव' में संकलित संस्मरण अच्छे हैं। इसे पढ़ा जाना चाहिए।

Wednesday, 1 August 2018

ईद की सुबह और खुशी


ईद से एक दिन पहले लहलहाती नीम और खुशी

15 june 2018

रमज़ान का आज आखिरी रोजा है। इस बार 29 रोजों के बाद कल ईद होगी। आज कितना मनोहर, कितना सुहावना प्रभात है। घर की छत पर फैली नीम की शाखाएं ठंडी हवा बहा रही हैं। हर पत्ती हरियाली में डूबी है। आसमान पर सुकून भरी लालिमा दिख रही है। आज का सूरज देखो, कितना प्यारा, कितना शीतल है, मानो संसार को ईद की बधाई दे रहा है। खेतों की अपनी एक अलग ही रौनक है। गेहूं कटने के बाद से खेत खाली, सूखे हैं पर कितने सुंदर हैं। कुछ में चारे की कर्बी लहलहा रही है।

मोहल्ले में कितनी हलचल है। कल ईदगाह जाने की तैयारियां आज ही हो रही हैं। महक और खुशबू के कपड़े तैयार हो गए हैं। दोनों मेरी चचेरी छोटी बहने हैं। महक नाराज है, उसे आधुनिक ड्रेस पहननी थी लेकिन पारंपरिक सूट सिला दिया गया है। दानिश को फिक्र नहीं है वो तो सुबह मिलीं लीचियां पाकर ही खुश है। पड़ोस के बच्चे एकदूसरे के कपड़ों से तुलना कर रहे हैं। कुर्ता पजामा वालों पर जीन्स शर्ट वाले भारी पड़ रहे हैं। ईद की खुशियां कल सौ गुना बढ़ जाएंगी, उत्साह चरम पर होगा। अब तो आज शाम के चांद और कल के सूरज का बेसब्री से इंतज़ार है।
सभी साथियों, वरिष्ठजनों को ईद की अग्रिम बधाई।


ईद की सुबह और खुशी

16 june 2018

गांव में कितनी हलचल है। मियन टोला सौगुनी खुशियों से लबरेज़ है। फजिर की नमाज़ के बाद से लोग ईदगाह जाने की तैयारियों में जुटे हैं। ईद की सुबह बहुत ब्यस्त है। किसी के कुरते का बटन टंकना रह गया है तो कोई चौराहे पर रवी नाई के यहां दाढ़ी सेट कराने की जल्दी में है। बकरियां चराने से आज जोसेफ, शीबू, तहशीम को छुट्टी मिली है, वे सब बहुत खुश हैं। बकरियां भी आज घास-फूस नहीं खाएंगी, उनकी भी ईद है। कुनाई वाला मुलायम भूसा, सूखी खरी, चोकर और आटा मिली हुई लज़ीज़ सानी खा रही हैं। थोड़ी देर में गेहूं-बिझरा और सेवइयां भी खाएंगी। तौफीक ने भैंसिया को चारा-पानी देकर नहला भी दिया है।

कल जोहर की नमाज़ से पहले पेश ईमाम ने ईद की नमाज़ का वक्त 9:30 बजे मुकर्रर किया था। बहुत भीड़ थी मस्ज़िद में। आज तो और भी ज़्यादा होगी। दूर के गावों से नमाज़ी आएंगे। जो जल्दी पहुंचेगा वो आगे की सफ़ में नमाज़ अता करेगा। हालांकि, बच्चे चाहे कितनी भी जल्दी पहुंचें उन्हें पीछे की सफ में ही खड़ा होना पड़ेगा। जुल्फिकार, आरिफ, मुबीश और नफीश ने अपनी मोटरसाइकिलें धुल कर साफ कर ली हैं। वे चमचमा रही हैं।

दानिश अभी अभी नहाकर गया है। मेरे खानदान का सबसे छोटा चिराग है, चाचा का एकलौता बेटा है। हालांकि, उससे बढ़ा फैजल था, लेकिन 2013 में आए जापानी बुखार ने उसे लील लिया। लाख कोशिशों के बावजूद हम उसे बचा न सके। खुदा से चच्ची का रोज-रोज का बिलखना देखा न गया और दानिश की शक्ल देकर अल्लाह ने फैजल को वापिस भेज दिया। अभी एक साल उम्र है दानिश की, वो मोटर के ठंडे पानी से नहाता है। नल का पानी उसे रास नहीं आता। तड़के से ही अपने बड़े पापा यानी मेरे पापा के पास भाग आता है, उन्हीं के साथ नहाता है और चाय पीता है। आज बहुत खुश है। तेजी में गया है नए कपड़े पहनकर अभी आएगा दिखाने।

बौवन शकील को ढूंढ़ रहा है। उसे फातिहा दिलानी है। शकील दीनी-तालीम के मामले में मुहल्ले के सबसे जानकार हैं। अफसोस कि उनका हफ़िज़ा मुकम्मल न हो सका। पर मोहल्ले के वही हाफिज वही मौलाना हैं। आज वे बहुत ब्यस्त हैं। एक घर से फ़ातिहा देकर निकलते हैं दूसरा उन्हें पकड़ ले जाता है। इस जल्दी में उत्साह ज़बरदस्त है। खुशी सौगुनी है।

मस्जिद के बाहर और अंदर खड़े नीम के घने वृक्षों की छाया। नीचे पक्का फर्श है, जिस पर खूबसूरत कालीन और दरी बिछी हुई है। नमाजियों की कई सफ हैं। नमाजियों की सफें एक के पीछे एक काफी दूर तक चली गई हैं, पक्की फर्श के नीचे तक, जहां कुछ बिछा भी नहीं है। नए आने वाले आकर पीछे की कतार में खड़े हो जाते हैं। आगे जगह नहीं है। यहां कोई धन और पद नहीं देखता। इस्लाम की निगाह में सब बराबर हैं। मस्जिद और मदरसा कमेटी के कुछ लोगों के पास भीड़ जमा है। वे लोग गोलाकार बैठे हुए हैं बीच में रसीद, बैग, पंपलेट और सालाना कैलेंडर रखे हैं। खजांची की दो बैग रुपयों से भर चुकी हैं। अभी बहुत नोट उनकी पालथी में बिखरे हैं। यह सब रकम फितरे की है। लोग जल्दी फितरा जमा कर सुन्नतें पढ़ना चाह रहे हैं। माइक पर मौलाना साहब नमाज के वक्त की याद दिलाकर लोगों को जल्दी वजू करने और सफ सीधी करने का ऐलान कर रहे हैं। फितरा जमा किए बिना ईद की नमाज मुकम्मल नहीं होती है। 


लोगों ने वजू किया और पिछली पंक्ति में खड़े हो गये। कितना सुंदर संचालन है, कितनी सुन्दर व्यवस्था। पेश ईमाम ने नीयत का तरीका नमाजियों को बताया, तकबीर पढ़ी गई। लाखों सिर एक साथ सिजदे में झुक जाते हैं, फिर सब-के-सब एक साथ खड़े हो जाते हैं, एक साथ झुकते हैं और एक साथ घुटनों के बल बैठ जाते हैं। नमाज पूरी होने तक कई बार यह दोहराया जाता है। यह नजारा ठीक वैसे ही है जैसे बिजली की लाखों बत्तियां एक साथ जलें और एक साथ बुझ जाएं। यह क्रम नमाज के खत्म होने तक जारी रहता है। कितना अद्भुत नजारा है, जिसकी सामूहिक क्रियाऐं विस्तार और अनन्तता हृदय को श्रद्धा, गर्व और आत्मानन्द से भर देती हैं, मानो इंसानियत का एक धागा इन सभी रूहों को एक लड़ी में पिरोए हुए है। इस बार 29 रोजों के बाद ईद आई है। किसी ने 30 रोज़े भी रखे हैं। नमाज़ के बाद फिर अगले रमज़ान का इंतज़ार होगा।

दुआ है, ये ईद आपके जीवन में अनंत खुशियां देकर जाए। देश में अमन-चैन कायम रहे। सभी साथियों, वरिष्ठजनों को ईद की तहेदिल से मुबारकबाद।

Tuesday, 31 July 2018

बकरी और अबरार का दर्द

बकरियां बुरी तरह डरी हुई हैं। अभी रात के दो बज रहे हैं। उनके शोर से घर के सभी लोग जग गए हैं। मुहल्ले में भी जनसर हो गई। पहले बड़ी वाली बकरी ही चिल्ला रही थी, धीरे धीरे पांचों बकरियां शोर करने लगीं। मैं इस्माइल के घर में हूं। उसके घर के बरोठे का ये नजारा वाकई में सबके लिए चौकाने वाला है। लेकिन कोई समझ कुछ नहीं पा रहा है। उसके अब्बा (बाबा) जग तो गए हैं लेकिन मच्छरदानी से बाहर नहीं निकलना चाहते। दरअसल बरोठे में जहां बकरियां बंधीं हैं वहां मच्छर कुछ ज्यादा हैं। वे चारपाई से ही सबको हांक रहे हैं, सब अपने-अपने घर जाओ, भीड़ मत बढ़ाओ। बकरियां अपने आप चुप हो जाएंगी। उनकी ऐसी बेरुखी से कुछ लोग जा चुके हैं, कुछ जा रहे हैं।


बकरियों का यूं चिल्लाना अबरार से सहन नहीं हो रहा। इससे पहले उसने अपनी बकरियों को यूं सहमते नहीं देखा। वही तो है जो बकरियों को खेतों में चराने ले जाता है। वह आठ साल का है। बकरियां उसे बहुत प्यारी हैं। एकतरह से बकरियां उसकी दोस्त हैं। स्कूल से आते ही कडुए तेल से चुपड़ी और बुकनू लगी रोटी ले वह उन्हें चराने चल देता है। मुहल्ले के लोग उसे नन्हा बरेदी कहते हैं। ग्रामीण इलाकों में बकरियां पालने वाले को बरेदी कहा जाता है। बकरियां अभी भी सहज नहीं हुई हैं। अबरार सुबक रहा है। उसने सभी बकरियों के नाम रखे हैं। जो सफेद-काली है उसे चितकबरी, जो लाल-काली है उसे लालमनी और छोटी वाली बकरी को वह छुनिया बुलाता है। इसी तरह बाकी बकरियों के भी नाम रखे हैं। छुनिया बाकी बकरियों की तरह नहीं चिल्ला रही बस बीच-बीच म्हे कर देती है। पर इस म्हे में दर्द बहुत है। छुनिया गर्भ से है, कुछ ही महीनों में वह भी मां का सुख भोगेगी। अबरार की सुबकन मुझसे नहीं देखी जा रही। बाकी लोग भी द्रवित हैं।

सुनातर या बरजतिया देख लिया होगा तभी चिल्ला रही हैं, अभी चुप हो जाएंगी, सोओ जाके सब लोग बतंघड़ न बनाओ, मंझली चच्ची गुस्से में सबसे बोलीं और दांत में दुपट्टा दबाके सोने चली गईं। सुनातर और बरजतिया सापों को कहा जाता है। सुनातर को सुनाई नहीं देता और बरजतिया काफी बड़ा होता है, तेज भागता है। गांवों में अक्सर ये सांप देखे जाते हैं, लेकिन वे बिरले ही लोगों को काटते हैं। वे चूहों के शिकार के लिए घरों में आ जाते हैं। ज्यादातर भूसा वाली कुठरिया में लकड़ी या कंडों के बीच छिप जाते हैं।

इस बीच राजू चाचा बोले चिटकान्हा हुई सकत है। धत्त झटिहा सार, भाग हेन ते बड़ा आओ बतावन चिटकान्हा हुई सकत है। अब्बा के अईसे गरियाने से राजू चाचा सकपका गए और धीरे से वहां से खिसक लिए। अब्बा मुहल्ले भर के अब्बा हैं, वे सब पे अपना हक जताते हैं। इसलिए उन्हें ज्यादातर लोग अब्बा ही कहते हैं। अब्बा का पारा गरम देख सब बगलें झांकने लगे और जाने को हुए कि तभी हवा का तेज झोंका आया और किवाड़े के बगल में ताक पर जल रहे चराग को बुझा गया। अब बरोठे में घुप्प अंधेरा हो गया। बकरियां जो थोड़ा सा चुप हुईं थीं अब फिर से चिल्लाने लगीं। अब्बा पहले से ही गुस्साए थे अंधियारा होने पर और तेजी से चिल्लाए, चराग कौन जलाएगा।

रहमान आंगन की तरफ भागा और चारपाई में बिछे बिस्तर में माचिस टटोलने लगा। चूल्हे के पास देख जा के वहीं रखी है माचिस, अम्मा ने जोर से कहा। रहमान ने चूल्हे के पास, पखिया और खाना रखने वाली दीवार में बनी टीपारी में
माचिस ढूंढी पर न मिली। बाहर जा मेरे बिस्तर में सिरहाने रखे कुर्ते में माचिस है ले के आ, अब्बा ने गरजते हुए कहा। रहमान ने कुर्ते से माचिस निकाल ली। उसने साथ में बालक बंडल से चार ठो बीड़ी भी निकालकर जेब में छिपा लीं। रहमान 15 बरस का है। गांव के अधिकांश किशोरवय लड़के बीड़ी और स्वागत तम्बाकू खाने लगे हैं। कुछ वक्त पहले गांव के भोला और महेश अपने पापा की बीड़ी चुराकर फूंकते पकड़े गए थे तो बहुत मार पड़ी थी। तब से सब नशा-पत्ती से दूर थे। लेकिन अब के छिटांक-छिटांक भर के लड़के चौधरी और पॉवर गुटखा भी खाते हैं, लेकिन छिप-छिपाकर। दांत लाल हो गए हैं, उन्हें साफ करने के लिए एक-एक घंटे तक नीम की दातून घिसते हैं। ज्यादातर नदिया किनारे बीड़ी पीने जाते हैं। कई सुबह शौच से पहले बीड़ी पीते हैं। बीड़ी नहीं मिलती तो उनका पेट साफ नहीं होता है। गांव के ज्यादातर मर्द नदी किनारे खुले में शौच करने जाते हैं। युवाओं की संख्या इनमें ज्यादा है। किसी-किसी के घर में ही शौचालय है।

अब्बा ने झिड़कते हुए रहमान के हाथ से माचिस छीनी और चराग जलाया। अभी एक मिनट भी न हुआ था कि चराग मद्धम होते हुए बुझने लगा। उन्होंने चराग हिलाया तो उसमें तेल खत्म हो गया था। अब वे फिर चिल्लाये, कोई काम ढंग से नहीं हो पाता है। न जाने का करेंगे सब। अब्बा और चिल्लाते इससे पहले ही अम्मा बोल पड़ीं- मिट्टी का तेल खत्म हो गया है। अबकी महीने में कोटेदार ने दुई लीटर तेल ही दिया था। एक चराग आप छपरा तरे रखते हो, दूसरा चूल्हे के पास रहता है जो बाद में रहमान और अबरार पढ़ने के लिए उठा ले जाते हैं और तीसरा बरोठे में बकरियों के पास जलता है, तीन ही चराग तो हैं घर में। इतना कहते-कहते अम्मा झुंझला गईं और आंगन में बिछी चारपाई पर जाके धम्म से बैठ गईं। ये सुनकर अब्बा का चेहरा और तमतमा गया। बोले-पब्लिक के लिए साला आता 5 लीटर तेल है पर मिलता 3 लीटर ही है, उसमें भी किसी-किसी महीने तो कोटेदार तेल गोल कर जाता है। अबकी तो दुई लीटर ही दिया हरामखोर ने। राशन के भी यही हाल हैं। मनमर्जी चल रही है सबकी। सब खुदै को अधिकारी और नेता समझते हैं। अईसे ही रहा तो अबकी साली सरकार बदलीही जाएगी।
अब्बा चराग जलाओ, रहमान ने धीरे से कहा। अब्बा ने रहमान के लाये चराग को जलाया।

बकरियां अब पहले से थोड़ा शांत थीं पर पूरी तरह नहीं। एक चुप होती तो दूसरी चिल्लाने लगती। मैं आंगन में पड़ी चारपाई में जा के पसर गया। सुबह के चार बजे गए थे। आसमान का कालापन कम हो रहा था। तारे अब कम गाढ़े दिख रहे थे। शंकर जी के मंदिर की घंटियां भी बजनी शुरू हो गईं थीं। आरती का समय हो गया था। मैं कब सो गया पता ही नहीं चला।
सुबह आंख खुली तो मैं उठा और बरोठे में गया जहां बकरियां बंधीं थीं, वहां एक भी बकरी नहीं थी। कोने में ढेर सारी राख फैली थी। मैं आंगन में फिर लौटा और चच्ची के कमरे की तरफ आवाज लगाई, पर कोई नहीं बोला। पास गया तो देखा दरवाजे पर कुंडी लगी हुई थी। पूरे घर में सन्नाटा पसरा था। मैं चारपाई में फिर बैठ गया। तभी बाहर से जोर-जोर से आवाजें आने लगीं तो बाहर की तरफ भागा और सीधे बाहर चउरा पर पहुंच गया। वहां लोगों की भीड़ लगी थी। रहमान, अब्बा, अम्मा, राजू चाचा और गांव भर के लोग जुट थे। एक किनारे अबरार बैठे रो रहा था उसके पास ही खून बिखरा पड़ा था। पास पहुंचा तो मैं अवाक रह गया। मुझे देख अबरार मुझसे चिपट गया और जोर-जोर से रोने लगा। पास में ही उसकी सबसे प्यारी बकरी छुनिया मरी पड़ी थी। उसके मुंह से झाग निकला हुआ था। बगल में उसका भ्रूण भी पड़ा था। राजू चाचा ने बताया किसी ने अब्बा से दुश्मनी निकालने के लिए रात में छुनिया के पेट में लात-घूंसे चलाये और कोई देख पाए इससे पहले ही भाग निकला। बाहर रास्ते की तरफ सो रहे चम्पू ने रात में बरोठे से निकल भागकर जाते एक आदमी को देखा था पर अंधेरा होने की वजह से वह पहचान नहीं पाया। चम्पू ने भी मुझसे इस बात की तस्दीक की। डॉक्टर साहब बता गए थे कि छुनिया को घास में मिलाकर जहर भी खिलाया गया।

घर वाले, मुहल्ले वाले सब गुस्से में हैं। हमारी तो किसी से दुश्मनी भी नहीं, कोई बेजुबानों से कैसे रंजिश निकाल सकता है, अम्मा रो रोकर कह रही हैं। अब्बा उन्हें ढांढस बंधा रहे हैं। बाकी बकरियां सदमे में हैं। किसी ने घास तक नहीं खाई है, वे पागुर तक नहीं कर रहीं हैं। घनघोर शोक में हैं वो। अबरार अभी भी मुझसे लिपटा हुआ है, उसके आंसुओं से मेरे पेट के पास की शर्ट गीली हो चुकी है। बाकी बची बकरियों और अबरार का दर्द एक है। उसे कोई नहीं समझ पाएगा। ये पीड़ा असहनीय है। पुलिस मामले की पड़ताल करने के लिए एक हजार रुपये मांग रही है। चउरे का माहौल शोकाकुल है। आज घर में खाना नहीं बनेगा।

नोट- ये कहानी सत्य घटना से प्रेरित है। इसे काल्पनिक समझने की चेस्टा न करें।

Monday, 30 July 2018

मौत के मकां















मौत के मकां, खूब हैं यहां
देख लो देख लो खूब गौर से
आ रहे लोग यहां दूर दूर से
न है किसी को पता न किसी को खबर
कितनी रेत डाली है कितनी छोड़ी डगर
बिल्डर ने सारे नियम तोड़ डाले हैं
सीमेंट सरिया हल्की डाली, कच्चे ईंट डाले हैं
हम गए हम गए तुम भी पहुंच गए
बातों में आके बिल्डर को नोट दे दिए
सोच न सके कुछ भी सोच न सके
हमने एक लिया प्लॉट तुमने दो लिये

प्लॉट के नाम पे फ्लैट दे दिया
बुरे फंसे बुरे फंसे हमको ठग लिया
मन मसोसकर फिर रहने चले गए
मकां सजा दिए पूजा भी कर दिए
रह रहे थे हम तो खूब शान से
अपने अपने घर में जो आलीशान थे
फिर नज़र लगी किसी कि दिन काला हो गया
जोर का शोर हुआ और गुबार छा गया
चारों ओर चारों ओर हर कोई रो पड़ा
आलीशां आलीशां मकां मेरा ढह गया

मौत आई मौत आई रूह कांप गई
गृहस्थी उजड़ गई ज़िन्दगी बिखर गई
भीड़ आई लोग आए जमघट भी लग गया
देखते देखते सपना वो थम गया
कुछ मरे कुछ दबे कुछ मिले भी नहीं
देखिए आज तो रोशनी भी काली हो गई
सब बिलख बिलख गये मुलाज़िम आ गया
पांच पांच लाख का ऐलान कर गया
मौत सस्ती देख के दिल ये रो गया
हाय हाय हाय क्या से क्या हो गया
जान गई माल गया वज़ूद भी चला गया
वो देखो वो देखो बिल्डर तो हंस रहा।

- रिज़वान नूर खान

Wednesday, 18 July 2018

रो रहीं बुंदेलखंड की ऐतिहासिक धरोहरें

झांसी स्थित राजा रघुनाथ राव का महल।

बुंदेलखंड के पांच जिलों में मौजूद 51 ऐतिहासिक स्मारकों के रखरखाव की स्थिति बदतर है। इन स्मारकों की सुरक्षा, देखभाल और संरक्षण के लिए
सरकार प्रतिवर्ष मात्र डेढ लाख रुपये इस मद में जारी करती है। इनके रखरखाव के लिए मात्र तीन कर्मचारी तैनात हैं। ऐसे में आप अंदाजा लगा सकते हैं कि ये कर्मचारी किस तरह अलग अलग जिलों में स्थापित ऐतिहासिक धरोहरों का संरक्षण करते होंगे।

रानी लक्ष्मीबाई की नगरी झांसी में सर्वाधिक धरोहरें हैं। इसके बाद चित्रकूट, ललितपुर, बांदा और जालौन में हैं। इस वर्ष पर्यटन मंत्रालय ने 51 स्मारकों की संख्या में बढ़ोत्तरी की है। ऐतिहासिक धरोंहरों-स्मारकों की सूची में इस बार 20 नाम और जोड़े गए हैं। यह एक तरह से अच्छा है लेकिन इनके संरक्षण के लिए मंत्रालय बजट बढ़ाना भूल गया है। अभी तक 51 स्मारकों के लिए ही यह रकम ऊंट के मुंह में जीरा साबित हो रही थी। अब स्मारकों की संख्या बढ़ाए जाने से हालात और बद्तर हो जाएंगे।
झांसी स्थित रघुनाथ राव महल के अंदर की तस्वीर।

जानकार बताते हैं कि पर्यटन की ओर केंद्र और राज्य सरकार झुकाव ज्यादा है नहीं। यही वजह है कि स्मरकों की संख्या में इजाफा जरूर किया गया लेकिन राशि नहीं बढ़ाई गई। पुरातत्व विभाग के जिम्मे यह स्मारक लगातार अपना अस्तित्व खोते जा रहे हैं। स्मारकों का सौंदर्यीकरण लंबे समय से नहीं किया गया है। ये जर्जर और खंडहर में तब्दील होते जा रहे हैं। यहां लोगों ने कब्जा कर निर्माण करा लिए हैं तो दीवारों की इंटें घिसती जा रही हैं। वहीं, दीवारों और छतों पर की गई शानदार नक्काशी मिटती जा रही है। झाड़-झंखार और गंदगी से परिसर पूरी तरह पटे हुए हैं।

वीरांगना लक्ष्मीबाई की नगरी झांसी में झांसी किला, रानीमहल, रघुनाथ राव महल और झोकनबाग सिमेट्री प्रमुख हैं। इन स्मारकों का निर्माण बुंदेलों और अग्रेजों के शासनकाल में किया गया है। राज्य पुरातत्व विभाग ने रानी महल  और झोकनबाग सिमेट्री को केंद्रीय पुरातत्व विभाग ने 1964 और 1978 में अपने संरक्षण में लिया था। इसके अलावा रघुनाथ राव महल को सन 2002 में संरक्षित धरोंहरों की सूची में शामिल किया गया। गौरवमयी यादें समेटे ये धरोहरें अतिक्रमण और गंदगी के चलते अस्तित्व खोती जा रही हैं। पुरातत्व  विभाग नगर निगम के पाले में गेंद डाल खुद को पाक साफ बताता है जबकि नगर निगम पुरातत्व अधिकारियों को इसके लिए जिम्मेदार मानता है।

वीरांगना लक्ष्मीबाई के रानी महल की पहली मंजिल का द्रश्य।
झांसी में पुरातत्व विभाग के अधिकारी एके दुबे बताते हैं कि लोगों के प्रदर्शन और मांग और विभाग के बार बार प्रस्ताव भेजने के बाद इस बार रघुनाथ राव महल के लिए शासन से 50 हजार रुपये अलग से जारी किए गए हैं। वे बताते हैं कि इस राशि की मदद से महल के चारों ओर कटीले तारों की फेसिंग कराएंगे ताकि अराजक तत्वों का आनाजाना बंद हो जाए। लेकिन रानी महल समेत अन्य स्मारकों के लिए कोई बजट अलग से जारी नहीं करना सरकार के उदासीन रवैये को जाहिर करता है।

डेढ़ लाख की रकम से सिर्फ झांसी जनपद के स्मारकों का संरक्षण ही नहीं हो पाता है तो ललितपुर, चित्रकूट, बांदा और जालौन के ऐतिहासिक स्मारकों के संरक्षण का क्या होगा। वर्तमान में कई स्मारक खंडहर में तब्दील हो चुके हैं तो कई जमींदोज होने की कगार पर पहुंच चुके हैं। पर्यटन और पुरातत्व विभाग जिला प्रशासन और नगर निगम पर अपनी जिम्मेदारी डाल रहा है जबकि ये दोनों पर्यटन और पुरातत्व विभाग को इस स्थिति के लिए जिम्मेदार बताते हैं। कुछ भी हो अगर इन स्मारकों के लिए जल्द और धनराशि जारी नहीं की गई तो आने वाले कुछ वर्षों में हम इन्हें सिर्फ किताबों में ही पढ़ सकेंगे। 

Monday, 16 July 2018

दुनिया की सबसे खतरनाक जेल ग्यातारामा


हाल ही बागपत जेल में कुख्यात माफिया मुन्ना बजरंगी की ताबड़तोड़ गोलियां मारकर हत्या कर दी गई। इससे पहले भी ऐसे कई मामले हो चुके हैं। जेल में हत्या हो जाना कोई नई बात नहीं है। दुनिया भर में ऐसा होता आया है। हालांकि, ऐसे मामलों के लिए मानवाधिकार आयोग और कानून बेहद सख्त है। अफ्रीका की रवांडा में रोज करीब दस कैदियों की हत्या कर दी जाती है। हालात ऐसे हैं कि मानवाधिकार आयोग और वैश्विक संगठन में ऐसा होने से नहीं रोक पा रहे हैं।

अपराधियों को दंड देने के लिए जेल में बंद करने की प्रथा जमाने पुरानी है। यूं तो दुनिया में बहुत सी जेलें ऐसी हैं जिन्हें खतरनाक माना जाता है। किन, अफ्रीका के रवांडा प्रांत के किगाली में स्थित ग्यातारामा जेल को दुनिया का नरक कहा जाता है। यहां हर दिन मौत तांडव करती है। जानकारों के मुताबिक यहां जो भी कैदी गया जिंदा अपने घर नहीं लौट सका। इस जेल मौत का रोज का आना जाना रहता है।

माना जाता है कि ग्यातारामा जेल बनने से पहले किगाली इलाके में दो जातियों के बीच वर्चस्व को लेकर लड़ाई शुरू हुई जो बाद में भयंकर हो गई। दोनों समुदायों के लोग एक-दूसरे के लोगों को मारने-काटने लगे। कई सालों तक यही हालात बने रहे। सरकार ने गृहयुद्ध के हालात काबू करने के लिए सेना को मैदान में उतार दिया। सेना ने दोनों समुदायों के खूंखार हत्यारों को कैद कर लिया। इन्हें बंद करने के लिए ग्यातारामा जेल का निर्माण कराया गया। जेल में भी दोनो समुदायों के लोग एक-दूसरे की हत्या से बाज नहीं आए। जो सिलसिला अभी भी जारी है।

जेल का माहौल इतना खतरनाक है कि यहां के कैदी अपने साथियों को ही मारकर खा जाते हैं। इसीलिए इस जेल को धरती का नरक भी कहा जाता है। क्षमता से अधिक कैदी होने के कारण यहां रात में सोने के लिए भी मारकाट करनी पड़ती है। एक हजार कैदी रखने की क्षमता वाली इस जेल में सात हजार कैदियों को बंद किया गया है। ऐसे में रात के समय बैरक में पैर रखने और खड़े रहने तक की जगह नहीं बचती है। नींद उसी को मिल पाती है जो सामने वाले को मार डालता है।


ऐसे हालात में यहां के कैदी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं। रोजमर्रा की चीजें पाने के लिए यहां मौत का खेल खेला जाता है। आंकड़ों के मुताबिक इस जेल में हर रोज कम से कम दस कैदियों की मौत होती है। इनमें से ज्यादातर की हत्या की गई होती है। यहां कैदियों से जानवरों से भी बदतर व्यवहार किया जाता है। यहां आने वाला कैदी कभी जिंदा वापस नहीं लौटता। इन हालातों को सुधारने के लिए वैश्विक मानवाधिकार आयोग और अन्य संगठन लगातार काम कर रहे हैं लेकिन स्थितियों में सुधार नहीं हो सका है। फिर भी यहां के कैदियों में जेल से रिहा होने की उम्मीद बाकी है।

Wednesday, 27 June 2018

बाबा जयशंकर की पंचायत


मन्दाकिनी के तट पर रमणीक भवन में स्कन्द और गणेश अपने-अपने वाहनों पर टहल रहे हैं। नारद भगवान् ने अपनी वीणा को कलह-राग में बजाते-बजाते उस कानन को पवित्र किया, अभिवादन के उपरान्त स्कन्द, गणेश और नारद में वार्ता होने लगी।

नारद-(स्कन्द से) आप बुद्धि-स्वामी गणेश के साथ रहते हैं, यह अच्छी बात है, (फिर गणेश से) और देव-सेनापति कुमार के साथ घूमते हैं, इससे (तोंद दिखाकर) आपका भी कल्याण ही है।

गणेश-क्या आप मुझे स्थूल समझकर ऐसा कह रहे हैं? आप नहीं जानते, हमने इसीलिए मूषक-वाहन रखा है, जिसमें देव-समाज में वाहन न होने की निन्दा कोई न करे, और नहीं तो बेचारा 'मूस' चलेगा कितना? मैं तो चल-फिर कर काम चला लेता हूँ। देखिये, जब जननी ने द्वारपाल का कार्यमुझे सौंप रखा था, तब मैंने कितना पराक्रम दिखाया था, प्रमथ गणों को अपनी पद-मर्यादा हमारे सोंटे की चोट से भूल जाना पड़ा। 

स्कन्द-बस रहने दो, यदि हम तुम्हें अपने साथ न टहलाते, तो भारत के आलसियों की तरह तुम भी हो जाते। गणेश-(हँसकर) ह-ह-ह-ह, नारदजी! देखते हैं न आप? लड़ाके लोगों से बुद्धि उतनी ही समीप रहतीहै, जितनी की हिमालय से दक्षिणी समुद्र!

स्कन्द-और यह भी सुना है।-ढोल के भीतर पोल! गणेश-अच्छा तो नारद ही इस बात का निर्णय करेंगे कि कौन बड़ा है। नारद-भाई, मैं तो नहीं निर्णय करूँगा; पर, आप लोगों के लिए एक पंचायत करवा दूँगा, जिसमें आप ही निर्णय हो जायगा। इतना कहकर नारदजी चलते बने।

वटवृक्ष-तल सुखासीन शंकर के सामने नारद हाथ जोड़कर खड़े हैं। दयानिधि शंकर ने हँसकर पूछा-क्यों वत्स नारद! आज अपना कुछ नित्य कार्य किया या नहीं?'' नारद ने विनीत होकर कहा-नाथ, वह कौन कार्य है?'' जननी ने हँसकर कहा-वही कलह-कार्य।नारद-माता! आप भी ऐसा कहेंगी, तो नारद हो चुके; यह तो लोग समझते ही नहीं कि यह महामाया ही की माया है, बस, हमारा नाम कलह-प्रिय रख दिया है। महामाया सुनकर हँसने लगीं।
शंकर-(हँसकर)-कहो, आज का क्या समाचार है? 
नारद-और क्या, अभी तो आप यों ही मुझे कलहकारी समझे हुए बैठे हैं, मैं कुछ कहूँगा, तो कहेंगे कि बस तुम्हीं ने सब किया है। मैं जाता तो हूँ झगड़ा छुड़ाने, पर, लोग मुझी को कहते हैं।
शंकर-नहीं, नहीं, तुम निर्भय होकर कहो।
नारद-आज कुमार से और गणेशजी से डण्डेबाजी हो चुकी थी। मैंने कहा-आप लोग ठहर जाइए, मैं पंचायत करके आप लोगों का कलह दूर कर दूँगा। इस पर वे लोग मान गये हैं। अब आप शीघ्र उन लोगों के पञ्च बनकर उनका निबटारा कीजिए।
शंकर-यहाँ तक! अच्छा, झगड़ा किस बात का है?
नारद-यही कि देवसेना-पति होने से कुमार अपने को बड़ा समझते हैं, और (जननी की ओर देखकर) बुद्धिमान होने से गणेश अपने को बड़ा समझते हैं।
जननी-हाँ-हाँ, ठीक ही तो है, गणेश बड़ा बुद्धिमान है।
शंकर ने देखा कि यह तो यहाँ भी कलह उत्पन्न किया चाहता है, इसलिए वे बोले-वत्स! तुम इसमें अपने पिता को ही पञ्च मानो, कारण कि जिसको हम बड़ा कहेंगे, दूसरा समझेगा कि पिता नेहमारा अनादर किया है-अस्तु, तुम शीघ्र ही इसका आयोजन करके दोनों को शान्त करो। नारद ने देखा कि, यहाँ दाल नहीं गलती, तो जगत्पिता के चरण-रज लेकर बिदा हुए।
नारद अपने पिता ब्रह्मा के पास पहुँचे। उन्होंने सब हाल सुनकर कहा-वत्स! तुझे क्या पड़ी रहती है, जो तू लड़ाई-झगड़ों में अग्रगामी बना रहता है, और व्यर्थ अपवाद सुनता है?
नारद-पिता! आप तो केवल संसार को बनाना जानते हैं, यह नहीं जानते कि संसार में कार्य किस प्रकार से चलता है। यदि दो-चार को लड़ाओ न, और उनका निबटारा न करो, तो फिर कौन पूछताहै? देखिए, इसी से देव-समाज में नारद-नारद हो रहा है, और किसी भी अपने पुत्र की आपने देव-समाज में इतनी चर्चा सुनी है?
ब्रह्मा-तो क्या तुझे प्रसिद्धि का यही मार्ग मिला है?
नारद-मुझे तो इसमें सुख मिलता है- ''येन केन प्रकारेण प्रसिद्ध: पुरुषो भवेत् ।''
ब्रह्मा-अब तो शंकर की आज्ञा हुई है, जैसे-तैसे इसको करना ही होगा, किन्तु हम देखते हैं कि गणेशजी जननी को प्रिय हैं; अतएव यदि उनकी कुछ भी निचाई होगी, तो जननी दूसरी बात समझेंगी! अस्तु! अब कोई ऐसा उपाय करना होगा कि जिसमें बुद्धि से जो जीते, वही विजयी हो।अच्छा, अब सबको शंकर के समीप इकठ्ठा करो। नारद यह सुनकर प्रणाम करके चले।
विशाल वटवृक्षतले सब देवताओं से सुशोभित शंकर विराजमान हैं। पंचायत जम रही है। ब्रह्माजी कुछ सोचकर बोले-गणेशजी और कुमार में इस बात का झगड़ा हुआ है कि कौन बड़ा है? अस्तु, हम यह कहते हैं कि जो इन लोगों में से समग्र विश्व की परिक्रमा करके पहले आवेगा, वही बड़ा होगा। स्कन्द ने सोचा-चलो अच्छी भई, गणेश स्वयं तुन्दिल हैं-मूषक-वाहन पर कहाँ तक दौड़ेंगे, और मोर पर मैं शीघ्र ही पृथ्वी की परिक्रमा कर आऊँगा। फिर वह मोर पर सवार होकर दौड़े। गणेश ने सोचा कि भव और भवानी ही तो पिता-माता हैं, अब उनसे बढक़र कौन विश्व होगा। अस्तु, यह विचारकर शीघ्र ही जगज्जनक, जननी की परिक्रमा करके बैठ गये।

जब कुमार जल्दी-जल्दी घूमकर आये, तो देखा, तुन्दिलजी अपने स्थान पर बैठे हैं। ब्रह्मा ने कहा-देखो, गणेशजी आपके पहले घूमकर आ गये हैं! स्कन्द ने क्रोधित होकर कहा-सो कैसे? मैंने तो पथ में इन्हें कहीं नहीं देखा!
ब्रह्मा ने कहा-क्या मार्ग में मूषक का पद-चिह्न आपको कहीं नहीं दिखाई पड़ा था?

स्कन्द ने कहा-हाँ, पद-चिह्न तो देखा था।
ब्रह्मा ने कहा-उन्होंने विश्वरूप जगज्जनक, जननी ही की परिक्रमा कर ली है। सो भी तुम्हारे पहले ही।
स्कन्द लज्जित होकर चुप हो रहे।

Sunday, 10 June 2018

बुंदेलखंड का सूखा

बुंदेलखंड हमेशा से कम बारिश वाला इलाका रहा है, लेकिन 2002 से लगातार सूखे ने मर्ज़ को तकरीबन लाइलाज बना दिया है.यह जमीनी बताती है कि बुंदेलखंड को ईमानदार कोशिशों की ज़रूरत है. साफ-सुथरी सरकारी मशीनरी अगर आम लोगों को साथ लेकर कोशिश करे तो सूखता जा रहा बुंदेलखंड शायद फिर जी उठे।


दिल्ली के पास वैशाली में तकरीबन नियमित रूप से एक रिक्शेवालेचेतराम से मेरी मुलाकात होती है जो अमूमन सफ़ेद कमीज़ और पाजामे में होता है। वही चेतराम मुझे एक रोज़ अपने घर के असबाब के साथ सड़क पर खड़ा मिल गया। उसकी झुग्गी उजाड़ दी गई थी। आनंद विहार, दिल्ली की सरहद है और एक सड़क इस केंद्रशासित प्रदेश को उत्तर प्रदेश से अलग करती है। इसी सड़क से थोड़ा और आगे जाएंगे तो वैशाली और इंदिरापुरम जैसी पॉशकॉलोनियां हैं।

वैशाली में, जहां मैं रहता हूं, आसपास अभी अनगिनत खाली प्लॉट हैं, जिनपर न जाने कितने लोग झुग्गियां बनाकर रहते हैं। वहां महागुनमेट्रो और शॉप्रिक्स जैसे चमचमाते मॉल्स हैं, जहां की दुनिया में पॉपकॉर्न जैसी चीज़ें मक्खन के साथ खाई जाती हैं, उससे थोड़ा आगे ही करोड़ों की कीमत वाले खाली प्लॉट्स पर झुग्गियों में न जाने कितनी ज़िंदगियां अपने अरबों-खरबों के सपनों को जीने लिए जाने कहां-कहां से आती हैं।

चेतराम भी उन्हीं में से एक हैं, जो उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड से पलायन करने को मजबूर हुए हैं। बिरादरी से दलित चेतराम पेट पालने के चक्कर में घर छोड़कर यहां किसी और की ज़मीन पर रहते हैं, जहां उनकी झुग्गी अवैध और गंदी बस्ती के रूप में गिनी जाती है।

ऐसी ही किसी गिनती को कम करने के लिए गाज़ियाबाद विकास प्राधिकरण ने सभी खाली प्लॉटवालों को अपने प्लॉट पर निर्माण कार्य शुरू कराने का आदेश दिया, ऐसा न करने पर आवंटन रद्द कर दिया जाता। इसीलिए, चेतराम की झुग्गी उजाड़ दी गई। झुग्गी ही नहीं उजड़ी, उनका घर और उनकी दुनिया भी उजड़ गई। अब चेतराम और उसके गांव के उसके ही जैसे लोग, मकनपुर गांव में रहते हैं। वहां भी वो किसी खाली ज़मीन पर ही रहते हैं, जहां रोज़मर्रा की दिक्कतें हैं। पानी की, शौच की, सफ़ाई की, हर क़िस्म की दिक़्क़त।

चेतराम, बुंदेलखंड के अपने गांव गन्हौली से निकले तो अपने पीछे सात बीघा ज़मीन छोड़कर आए थे। वे बड़े शान से बताते हैं कि उनका इलाका बेमिसाल राजाओं का इलाक़ा रहा है। राजा परमार देव का ज़िक्र करते हुए चेतराम कहते हैं-बड़े लड़इयामहुबे वाले, इनकी मार सही न जाए। ठीक है कि इतिहास में महोबे के वीरों की मार बहुत भारी थी और उन्हें हराना कठिन था लेकिन आज की तारीख़ में पानी ने सबको त्रस्त करके रख दिया है।

चेतराम के इलाक़े में एक के बाद कई एक बरसों तक नियमति बारिश नहीं होने से खेती फ़ायदे का सौदा नहीं रह गया। सात बीघा ज़मीन को बटाई पर लगाकर, काम की तलाश में चेतराम सपरिवार दिल्ली आ गए। बटाई वाली ज़मीन से कुछ मिलता नहीं। दिल्ली में वे ख़ून-पसीना बहाते हुए रिक्शा चलाते हैं। लेकिन उनकी आंखों में गांव वापस जाने का सपना और उम्मीद भी ज़िंदा है।

केन नदी के किनारे ज़िंदगी उम्मीद के सहारे आगे बढ़ती है। शायद इसी ने ज़िंदा रखा था, गढ़ा गांव के प्रह्लाद सिंह को। बड़ी-बड़ी शानदार मूंछों वाले प्रह्लाद सिंह ने अपनी जवानी में किसी का क़त्ल कर दिया था। क़त्ल का जुर्म अदालत में साबित हो गया, 1962 में बांदा ज़िला अदालत ने उन्हें सज़ा-ए-मौत सुनाई। लेकिन, प्रह्लाद सिंह को राष्ट्रपति से जीवनदान मिला और उनकी सज़ा आजीवन कारावास में बदल दी गई।

प्रह्लाद सिंह ने दस साल जेल में काटे थे कि सन बहत्तर में नेकचलनी की वजह से उन्हें वक़्त से पहले रिहा कर दिया गया। प्रह्लाद, गांव लौटे तो नई उम्मीद के साथ ज़िंदगी को दोबारा पटरी पर लाने की कोशिश की। गृहस्थी की गाड़ी चल निकली। अभी एक दशक पहले तक सब कुछ ठीक-ठाक था। लेकिन परिवार बड़ा हुआ तो प्रह्लाद सिंह और उनके भाई ने मिलकर ट्रैक्टर के लिए बैंक से कर्ज़ ले लिया। इसी कर्ज़ ने उनके परिवार को बरबाद कर दिया।

Thursday, 5 April 2018

भारत बंद

दलित आंदोलन के पीछे का सच


सोमवार को पूरे देश में दलित संगठनों की ओर से बुलाए गए भारत बंद के दौरान हुई हिंसा में अब तक दस लोगों की जान जा चुकी है। हिंसा में बदला दलित आंदोलन देश के उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, बिहार, झारखंड, राजस्थान, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र समेत करीब 20 राज्यों में फैल चुका है। क्या आप जानते हैं कि भारत बंद या दलित आंदोलन के पीछे की असली वजह क्या है। क्यूं यह मुद्दा इतना गरमा गया है। अगर नहीं जानते तो हम आपको बताते हैं।


दरअसल, बीते 20 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश में एससी/एसटी एक्ट के दुरुपयोग पर चिंता जताई थी और इसके तहत मामलों में तुरंत गिरफ़्तारी की बजाय शुरुआती जांच की बात कही थी। यहां बता दें कि एससी/एसटी (प्रिवेंशन ऑफ़ एट्रोसिटीज़) एक्ट अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों को अत्याचार और भेदभाव से बचाने वाला क़ानून है। इसके तहत कोई भी ऊंची जाति-बिरादरी या कोई भी व्यक्ति दलितों का अपमान नहीं कर सकता है। जातिसूचक शब्दों का प्रयोग नहीं कर सकता है। ऐसा करने पर इस एक्ट के तहत भारी दंड का प्रावधान है।

20 मार्च को आए सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से इस क़ानून का डर कम होने और नतीज़तन दलितों के प्रति भेदभाव और उत्पीड़न के मामले बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। ये जानना भी ज़रूरी है कि आख़िर सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा फ़ैसला क्यों दिया और ये क्यों कहा कि एससी/एसटी एक्ट का बेज़ा इस्तेमाल हो रहा है।

इस मामले की कहानी शुरू होती है महाराष्ट्र के सतारा ज़िले के गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ़ फ़ार्मेसी, कराड से। इस कॉलेज के स्टोरकीपर भास्कर करभारी गायकवाड़ की सालाना गोपनीय रिपोर्ट में उनके ख़िलाफ़ निगेटिव कॉमेंट्स किए गए। एससी/एसटी समुदाय से ताल्लुक रखने वाले भाष्कर के ख़िलाफ़ ये कॉमेंट्स उनके आला अधिकारी डॉक्टर सतीश भिसे और डॉक्टर किशोर बुराडे ने किए थे जो इस वर्ग से नहीं आते थे। सतीश भिसे और किशोर बुराडे की रिपोर्ट के मुताबिक़ भास्कर अपना काम ठीक से नहीं करते थे और उनका चरित्र ठीक नहीं था।

खुद पर ऐसी टिप्पणी किए जाने से नाराज भाष्कर ने आपत्ति जताई और 4 जनवरी 2006 को सतीश भिसे और किशोर बुराडे के ख़िलाफ़ कराड पुलिस थाने में एफ़आईआर दर्ज कराई। भास्कर ने 28 मार्च 2016 को इस मामले में एक और एफ़आईआर दर्ज कराई जिसमें सतीश भिसे और किशोर बुराडे के अलावा उनकी शिकायत पर कार्रवाई न करने वाले दूसरे अधिकारियों को भी नामजद किया गया। एससी/एसटी एक्ट के तहत आरोपों की जद में आए अधिकारियों का कहना था कि उन्होंने अपनी आधिकारिक क्षमता में अपने अच्छे विवेक का इस्तेमाल करते हुए ये प्रशासनिक फ़ैसले लिए थे। किसी स्टाफ़ की सालाना गोपनीय रिपोर्ट में उसके ख़िलाफ़ निगेटिव कॉमेंट्स अपराध नहीं कहे जा सकते, भले ही उनका आदेश ग़लत ही क्यों न हो।

आरोपित अधिकारियों ने यह भी कहा कि अगर एससी/एसटी एक्ट के तहत दर्ज मामले खारिज़ नहीं किए जाते तो अनुसूचित जाति और जनजाति से ताल्लुक रखने वाले स्टाफ़ की सालाना गोपनीय रिपोर्ट में सही तरीके से भी निगेटिव कॉमेंट्स दर्ज कराना मुश्किल हो जाएगा। इससे प्रशासन के लिए दिक्कत बढ़ जाएगी और वैध तरीके से भी सरकारी काम करना बेहद मुश्किल हो जाएगा।


इस मामले की सुनवाई के बाद 20 मार्च 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश में इस एससी/एसटी एक्ट के दुरुपयोग पर चिंता जताई थी और इसके तहत मामलों में तुरंत गिरफ़्तारी की बजाय शुरुआती जांच की बात कही थी। जानकारों का कहना है कि एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट की आपत्ति करने से सरकार को इस कानून में बदलाव करने का मौका मिल गया। ऐसे में दलितों को चिंता सताने लगी कि उनके अधिकारों और न्याय की रक्षा करने वाला यह कानून बदल गया तो ऊंची जाति या धनवान व्यक्ति उनका शोषण करने लगेंगे। कानून में संशोधन में न हो इसके लिए दलित संगठनों ने सोमवार को पूरे देश में भारत बंद का ऐलान किया था। दलितों का यह आंदोलन हिंसा की भेंट चढ़ गया।

भारत बंद की अपील करने वाले अनुसूचित जाति-जनजाति संगठनों के अखिल भारतीय महासंघ के राष्ट्रीय प्रधान महासचिव केपी चौधरी ने बताया कि इस एक्ट (क़ानून) से दलित समाज का बचाव होता था। दलितों पर अत्याचार करने वालों के लिए यह एक्ट एससी-एसटी एक्ट चाबुक की तरह काम कर रहा था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से परिस्थितियां उलट होने की संभावना बन गई है। ऐसे में इस वर्ग का प्रत्येक व्यक्ति दुखी और आहत है और ख़ुद को पूरी तरह से असुरक्षित महसूस कर रहा है।

जस्टिस एके गोयल और जस्टिस यूयू ललित की खंडपीठ के फ़ैसले पर पुनर्विचार के लिए केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को याचिका दायर कर दी है। हालांकि अब ये सुप्रीम कोर्ट पर निर्भर करता है कि उसका क्या रुख होता है।

इनपुट: बीबीसी से

Monday, 18 December 2017

महान क्रांतिकारी चे ग्वेरा का अंतिम पत्र



9 अक्टुबर,1967 को बोलिविया में अर्नेस्टो चे ग्वेरा की हत्या कर दी गई। इस काम को अमेरिकी ग्रीन बेरेट से प्रशिक्षण हासिल करने वाले बोलिविया के सैनिक और सीआईए एजेंटों ने अंजाम दिया। चे के सम्मान में हम चे की ओर से फिदेल कास्त्रो को लिखे मशहूर फेयरवेल लेटर को पब्लिश कर रहे हैं। इस पत्र को 3 अक्टुबर, 1965 को फिदेल कास्त्रो ने चे की पत्नी और बच्चों की उपस्थिति में टेलीविजन पर पढ़ा था।


फिदेल,
इस वक्त मुझे कई लम्हे याद आ रहे हैं। मारिया एंटोनिया के घर पर आपसे मिलना और फिर मुझे क्यूबा आने का आपका निमंत्रण.. उसके बाद तैयारियों से जुड़े तनाव के क्षण, आज वो सब मेरे स्मृति पटल पर नांच रहे हैं।

एक दिन पूछा गया था कि हमें मृत्यु के लिए किसे जिम्मेदार मानना चाहिए। इस सवाल के जवाब में जब हम तथ्यों के तह में गए तो वास्तविकता ने हम सबको प्रभावित किया। हमने अच्छी तरह समझा कि सच्चा क्रांतिकारी वही है जो मृत्यु को गले लगाता है, और क्रान्ति में वही जीतता है या मृत्यु को प्राप्त होता है, यदि वह वास्तविक है। कई साथी विजय-मार्ग पर वीर-गति को प्राप्त हुए।

आज प्रत्येक वस्तु कम नाटकीय लगती है क्योंकि अब हम पहले से ज्यादा परिपक्व हैं। लेकिन तथ्य दोहराए जा रहे हैं। मैं अनुभव करता हूं कि मैं अपने कर्तव्य के उस हिस्से को पूरा कर चुका हूं, जिसने मुझे क्यूबाई क्रांति से उसी के क्षेत्र में बांध रखा था और अब मैं आपसे, अपने साथियों से, अपने लोगों से जो कि मेरे भी अपने सगे हैं, सभी से विदा लेता हूं।

मैं पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व में अपनी स्थिति, मंत्री और मेजर का पद और अपनी क्यूबाई नागरिकता को त्यागने की घोषणा करता हूं। अब कोई विधि नियम मुझे क्यूबा से नहीं बांधता। अब केवल वे ही बंधन हैं जो दूसरी प्रकृति के हैं और जो तोड़े नहीं जा सकते है बाकी पदों को तो तोड़ा और छोडा जा सकता है।

अपने अतीत को याद करते हुए मेरा विश्वास है कि मैने जहां तक संभव हुआ गौरव और निष्ठा के साथ क्रांतिकारी विजयों को संगठति करने में भरपूर योगदान किया है। मेरी गंभीर असफलता यही थी कि सारी माइस्त्रा की शुरुआती मुलाकात में मैने आप पर विश्वास नहीं किया था। मै नेता तथा क्रांतिकारी के रुप में आपके गुणों को तत्काल नहीं समझ पाया।

मैंने एक शानदार जीवन बिताया है । आपके साथ उस गौरव का अनुभव किया है जो कैरीबियन संकट के समय हमारी जनता के उन शानदार लेकिन तनावपूर्ण दिनों से जुड़ी है। आप जैसे तेज बुद्धि वाले राजनीतिज्ञ बहुत कम हैं। मुझे इस बात पर नाज है कि मैं बेहिचक आपके पदचिन्हों पर चला। आपकी चिंतनपद्धति को अपनाया और खतरों तथा सिद्धान्तों के विषय में आपके दृष्टिकोण को वास्तविक रुप में समझा।

संसार के अन्य राष्ट्र भी मुझसे ऐसे ही नम्र प्रयत्नों की मांग कर रहे हैं । मैं उस कार्य को करना चाहता हुं,जो क्यूबा के प्रधान होने के उत्तरदायित्व के कारण आपके लिए निषिद्ध हैं। और अब समय आ गया है जब हमें एक दूसरे से विदा ले लेनी चाहिए।

मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि मैं यह सब प्रसन्नता और दुख के मिलेजुले भावों के साथ कर रहा हूं। मैं यहां अपने सृजक की पवित्रतम आशाओं और प्रियजनों को छोड़ रहा हूं। मैं उस जनता को छोड़ रहा हूं,जिसने अपने पुत्र की तरह मेरा स्वागत किया । इस बात से मुझे गहरी पीडा हो रही है। मैं संघर्ष के अग्रिम स्थलों में उस विश्वास को ले जा रहा हूं,जो मैनें आपसे सीखा। जहां कहीं भी हो—मैं साम्राज्यवाद के विरुद्ध लडने के लिए अपनी जनता के अदम्य क्रांतिकारी उत्साह और पवित्र कर्तव्य भावना को अपने साथ ले जा रहा हूं। यह सोचकर मुझे प्रसन्न्ता होती है और विछोह की गहरी पीडा को झेलने का साहस भी मिलता है।

मैं एक बार फिर से घोषित करता हूं कि मैने क्यूबा को अपने उत्तरदायित्व से मुक्त कर दिया है। केवल एक बात को छोडकर जो उसके उदाहरण से ही पैदा होती है। यदि मेरा अंतिम क्षण मुझे किसी और आकाश के नीचे पाता है तो अंतिम विचार इस जनता और खास तौर पर आपके संबंध में होगा। मैं आपकी शिक्षा और आपके उदाहरण के लिए कृतज्ञ हूं और अपने कार्यों के अंतिम परिणामों को लेकर विश्वासपात्र बनने का प्रयास करता रहूंगा।

मैं क्रातिं के लिए विदेशी नीति से जुड़ा माना जाता हूं। और मैं उसे जारी रखूंगा। मैं जहां भी रहूंगा एक क्यूबाई क्रांतिकारी के उत्तरदायित्व को अनुभव करता रहूंगा और उसी के मुताबिक व्यवहार करुंगा। मुझे इस बात का कोई मलाल नहीं है कि मैं अपने बच्चों और पत्नी के लिए कोई संपति नहीं छोड रहा हूं। मुझे खुशी है कि ऐसा हुआ। मैं उनके लिए कोई मांग नहीं करता,क्योंकि मैं जानता हूं कि उनके जरूरी खर्च और शिक्षा की व्यवस्था राज्य करेगा।

मैं आपसे और अपनी जनता से बहुत कुछ कहना चाहूंगा। लेकिन मुझे लगता है कि यह सब अनावश्यक है। मैं जो कुछ कहना चाहता हूं,शब्द उसे अभिव्यक्त करने में असमर्थ हैं और मैं नहीं सोचता कि बेकार की मुहावरेबाजी का कोई मूल्य है।

सदा विजय के मार्ग पर ! या तो देश या मौत!

पूरे क्रांतिकारी भावना के साथ मैं आपको गले लगाता हूं

-चे
अप्रैल,1965

Sunday, 24 September 2017

तस्वीर के बहाने बाघुपर का दशहरा मेला

बाघपुर चौराहे पर बाबा खाद भंडार के सामने दुकान में पंचर बनाता मिस्त्री

मित्रों, चार साल पहले एक तस्वीर गूगल पर मिली थी। ये बाघुपर चौराहे की तस्वीर थी। स्कूल से छूटने के बाद कुछ छात्र बस/टेंपो के इंतजार में साइकिल पंचर वाले की दुकान पर खड़े हैं। ये दुकान बाबा खाद भंडार के ठीक सामने सड़क के उस पार है। 

खालीपन में छात्र यहां साइकिल की मरम्मत कर रहे मिस्त्री को गौर से देख रहे हैं। उसके काम को समझने का प्रयास कर रहे हैं, और मिस्त्री अपने काम की तल्लीनता में व्यस्त है। उसे फिक्र नहीं कौन उसके पास है। कितनी निगाहें  उसकी कारीगरी का नमूना देख रही हैं। काम कोई भी हो कलात्मकता और मेहनत का मेल उसे प्रचलित और लुभावना बना देता है।

दरअसल, हमारे यहां का ये अतिव्यस्त माना जाने वाला चौराहा है। कानपुर से 13 किलोमीटर पश्चिम की ओर शिवली रोड पर मिश्रित आबादी वाला बाघुपर कस्बा बसा हुआ है। जब मैं बाघपुर इंटर कॉलेज का छात्र था तब चौराहा बहुत विकसित नहीं था। गिनती की दुकानें थीं। अब काफी कुछ बदल गया है। चौराहे पर कई मार्केट बना दी गई हैं। छोटा और संकरा चौराहा काफी बड़ा हो गया है। यहां एक एटीएम भी है। लेकिन, एक-आध बार छोड़ दूं तो मुझे यहां से करेंसी नहीं मिली।

शायद बैँको को लगता होगा कि देहात क्षेत्र की वजह से यहां एटीएम का इस्तेमाल ज्यादा नहीं होता है। उनका सोचना कहीं तक सही है। लेकिन मेरे जैसे कई युवा जब भी अपने काम से छुट्टी लेकर गांव पहुंचते हैं तो उन्हें इस एटीएम पर बड़ा नाज होता है, और बाघपुर के विकसित होने का प्रमाण दिखाई देता है, लेकिन यह प्रमाण बहुत देर तक नहीं ठहरता। जैसे ही एटीम में प्रवेश किया और खाली हाथ लौटे तो कस्बे के अधूरे विकास की कहानी दिमाग में दौड़ जाती है।

कस्बे का एकमात्र बैंक ऑफ बड़ौदा ग्राहकों से भरा रहता है। मैं समझता हूं इस बैंक पर तकरीबन तीन दर्जन से अधिक गांवों की एक लाख से ज्यादा आबादी निर्भर है। यहां का ये इकलौता बैंक है। बैंक में ज्यादातर ग्रामीणों के खाते हैं। भीड़ और अव्यवस्था के चलते मैं यहां अपना खाता खुलवाने की हिम्मत नहीं जुटा सका। हालांकि, मेरे परिवार के अधकांश खाते इसी बैंक में हैं। इस के चलते कभी-कभार यहां जाना पड़ जाता है तो लंबी लाइन और समय अधिक लगने पर एक और बैंक की जरूरत महसूस होने लगती है।

दर्जनों गांवों से जुड़ा यह छोटा कस्बा कई बड़े जिलों, शहरों के लिए रास्ता देता है। यहां से आप पश्चिम की ओर चलेंगे तो औरैया, इटावा, कन्नौज होते हुए राजधानी दिल्ली तक पहुंच जाएंगे। यदि आप पूर्व की ओर चलते हैं  तो कानपुर शहर, फतेहपुर, बांदा, इलाहाबाद, पटना तक पहुंच जाएंगे। यहां से प्रदेश की राजधानी लखनऊ तकरीबन सौ किलोमीटर दूर है।

यहां का सबसे बड़ा पर्व विजयदशमी है। इस दौरान यहां 15 दिनों का लोकप्रिय मेला लगता है। इस दौरान भगवान श्रीराम के जीवन से जुड़े विभिन्न पड़ावों को बड़ी खूबसूरती से दिखाया जाता है। रामलीला कमेटी बाघुपर की ओर आयोजित इस समारोह में बड़ी संख्या में युवा, बुजुर्ग, महिलाएं विभिन्न तरीके से योगदान देते हैं।

मेला देखने के लिए सैकड़ों गांवों के लोग रोजाना यहां आते हैं। दोपहर बाद रात करीब दस बजे तक रामलीला का मंचन किया जाता है। इसके बाद रात में कृष्ण लीला का आयोजन चलता है। बाद के दिनों में नाटक और नृत्य से जुड़े कार्यक्रम भी चलते हैं। रावण वध से तीसरे दिन राज्य स्तरीय इनामी दंगल का आयोजन होता है। इसमें प्रदेश समेत पंजाब, हरियाणा, मध्यप्रदेश, दिल्ली समेत कई राज्यों के पहलवान अपनी ताकत और दांवपेच का प्रदर्शन करते हैं।

विजेता और उपविजेता पहलवान को नकद राशि देकर सम्मानित किया जाता है। मेले के अंतिम दिनों का यह सबसे लोकप्रिय आयोजन माना जाता है। रावण वध वाले दिन के बाद सबसे ज्यादा भीड़ दंगल के दिन ही होती है। इस दिन से महिलाओं की असल खरीदारी भी शुरू होती है। अगले तीन-चार दिनों तक दुकानकारों की बंपरी बिक्री होती है।

मेले की खास बात है कि यहां आने वाले दुकानदारों से किसी तरह का किराया आदि नहीं वसूला जाता है। यही वजह है कि हर साल यहां बड़ी संख्या में दुकानदार आते हैं। महिलाओं से जुड़ी वस्तुएं बेचने और खरीदने के लिए अलग गैलरी बनाई जाती है। ऐसा महिलाओं की सुरक्षा की दृष्टि से किया जाता है। आपसी मेलजोल-भाईचारे की वजह से सभी जाति-धर्मों के लोग दिल खोलकर मेले में हिस्सा लेते हैं।

अगर आप कानपुर या इसके आसपास के जिलों के रहने वाले हैं तो मेला देखने अवश्य जाएं। यहां आपको अलग ही अनुभूति होगी। सांस्कृतिक और पारंपरिक लोक कलाएं देखने को मिलेंगी। ग्रामीण परिवेश निश्चित ही आपको आकर्षित करेगा। 

Monday, 18 September 2017

तुम्हारे लिए



तुम्हें तो पंख मिले हैं फितरतन
जाओ न उड़ो तुम भी
कहो कि मेरा है आकाश

क्यों
आखिर क्यों चाहिए तुम्हें
उतनी ही हवा
जितनी उसकी बांहों के घेरे में है

क्यों है जमीन उतनी ही तुम्हारी
जहां तक वह पीपल घनेरा है
सुनी नहीं बहस तुमने टीवी पर
बिन ब्याही भी पूरी है औरत

क्या बैर है तुम्हारा उन सहेलियों से
जिनके पर्स में रखी माचिस
कहीं भी और कभी भी
चिंगारी फेंकने के लिए रहती है तैयार

बताओ आखिर
क्या मतलब है इसका
कि एक आईना भी नहीं है तुम्हारे पास
सिर्फ उसका अक्श छोड़कर

उसी में देखती हो संवरती हो
और कुछ वक्त बाद टूटकर बिखरती हो
अब संभल जाओ, खड़ी हो जाओ
क्योंकि नोच रहे हैं तुम्हें

तुम्हारा ये भोलापन ये सोखी अदा
डुबा देगी संसार
नतीजतन
भटक जाएंगे कई गूढ़ विचार

सुर्ख कपोल बिखेर रहे लालिमा
उफ ये जिंदादिल रुखसार
तुम्हारी जान नहीं लेगा, मरूंगा मैं
तलबगारी है तुमसे, भुगतना तो होगा

कब तक झुठलाओगी खुद को
हक जानकर भी अनजान हो
अभी नहीं तो कभी नहीं
पहचान लो खुद को, जाओ, दौड़ो
मलिका बनो दुनिया जहान की।

Saturday, 16 September 2017

जब आपका हक छीना जाएगा, आप भी रोहिंग्या बन जाएंगे

दर्द: हिंसा के बाद अपने बच्चों और परिवार के साथ पलायन करता रोहिंग्या।

रोहिंग्या के जरिए लोग अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं। ज्यादातर इस मुद्दे को हिंदू-मुस्लिम से जोड़कर देख रहे हैं। यही वजह है कि लोग बिना तह तक जाए, रोहिंग्या को आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा और आतंकवादी बताने से भी नहीं चूक रहे हैं। कई लोगों को मालूम तक नहीं है कि मसला क्या है, बस वे अपनी प्रतिक्रिया दिया जा रहे हैं। सोशल साइट्स पर रोहिंग्या मुसलमान ट्रोल हो रहा है। 

मेरे एक फेसबुक दोस्त हैं, वो तो रोहिंग्या पर इतने हमलावर हैं कि उन्हें अपशब्द कहने तक से पीछे नहीं हटते हैं। ऐसे में मैनें उनसे पूछ लिया कि बताइए रोहिंग्या कब से म्यांमार में रह रहे हैं और उन्हें किसने बसाया था। आप उन्हें किस आधार पर गलत मान रहे हैं तो वे जवाब न दे सके। बस इससे कश्मीर मुद्दा जोड़ते हुए हिंदू बनाम मुसलमान तक सीमित रह गए।

इसलिए यहां बताना चाहता हूं कि म्यांमार के रखाइन प्रांत में हिंसा के हालात क्यों हैं। क्या वजह है कि खून-खराबा हो रहा है। अगर, इंसानियत और मानवता को केंद्र में रखा जाए तो मुझे लगता है आप रोहिंग्या के आतंकवाद से जुड़े होने के आरोपों को सही नहीं मानेंगे। रोहिंग्या को बांग्लादेश से म्यांमार आया बताया जा रहा है। लेकिन ये सच नहीं है।

रोहिंग्या 1400 ईं से म्यांमार तबके बर्मा में रहते आ रहे हैं। उस वक्त राजा नारामीखला ने रोहिंग्या मुसलमानों को बसाया और अपने दरबार में सलाहकार समेत महत्वपूर्ण पदों पर आसीन किया। नागरिकता दी। समय बदला, राजे-रजवाड़े खत्म होने लगे, राजवंश समाप्त हुआ और अंग्रेजों ने बर्मा पर अधिकार कर लिया। तबसे बर्मा को आजाद करने के लिए आंदोलन और लड़ाइयां लड़ी जा रही हैं। 1948 में बर्मा को आजाद कराने में इन रोहिंग्या ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

आजादी के बाद म्यांमार पर सैन्य शासन हावी रहा और 1982 में म्यांमार सरकार ने कानून में संशोधन करते हुए इनकी नागरिकता छीन ली। तब से आज तक रोहिंग्या अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं। बौद्धों ने इन्हें कभी नहीं अपनाया। बहुतायत में होने के कारण बौद्ध रोहिंग्या पर हमलावर बने रहे। संयुक्त राष्ट्र में लंबे समय से इनकी नागरिकता को लेकर म्यांमार पर दबाव बनाया जाता रहा है। चुनाव जीतने की लालसा ने सरकार को बहुसंख्यक बौद्धों की ओर झुकाए रखा।

नतीजतन, रोहिंग्या के कुछ नौजवान अपनी नागरिकता, हक और सुविधाएं पाने के लिए मैदान में कूद पड़े। क्रांतिकारी रूप अपना लिया। संगठन बना लिया। तो सेना हमलावर हो गई। मासूमों की जान ली गई, युवतियों-महिलाओं की आबरू लूट ली गई। सेना का विरोध किया तो इन्हें आतंकवाद से जोड़ दिया गया।

बहरहाल, आंकड़े बताते हैं कि 700 ईं. से म्यांमार में रह रहे रोहिंग्या को चरमपंथियों ने बांग्लादेशी बता दिया। जबकि बांग्लादेश का उदय कब हुआ ये तो हर जानकार हिंदुस्तानी जानता होगा। संयुक्त राष्ट के कई विद्धानों का मानना है कि रोहिंग्या पर लगातार हुए अत्याचारों के चलते वे बांग्लादेश, भारत और पाकिस्तान में शरण लेने को मजबूर हुए।

यहां मामला हिंदू बनाम मुसलमान का नहीं होना चाहिए। बल्कि मानवता पर केंद्रित हो तो लोग मामले को ज्यादा सटीक समझ सकेंगे। संयुक्त राष्ट्र समेत तमाम देश मानते हैं कि म्यांमार सरकार को रोहिंग्या को नागरिकता देनी चाहिए। इसके लिए भारत का दबाव बनाना आवश्यक है। मेरा मानना भी यही है कि वे म्यांमार में दशकों, पीढि़यों से रहते आ रहे हैं, उन्हें जाति विशेष से न जोड़कर नागरिकता समेत सभी मूल अधिकारी दिए जाएं। म्यांमार सरकार कुछ भी कहे, रोहिंग्या को नागरिकता देनी ही होगी।

एक बड़े अर्थशास्त्री हैं, वे बताते हैं कि जब भी आपकी स्वतंत्रता और अधिकार छीने जाएंगे आप मुखर होंगे, विरोध करेंगे। अपने स्तर से उसे पाने का प्रयत्न करेंगे। उदाहरण देखिए, पीढ़ियों से एक मकान आपका है। आपके बाबा, पिता के बाद अब आप भी उसमें रहते हैं। लेकिन एकाएक सरकार या कुछ लोग इसे अपना बताकर आपको बेदखल करने लगते हैं तो आपपे क्या गुजरती है। इसे वो भुक्तभोगी ही समझ सकता है। ऐसे में यदि आपके परिवार को नुकसाना पहुंचाया जाए तो आप हमलावर होंगे। अपनी संपत्ति और हक पाने के लिए लड़ेंगे, कुछ ताकतवर लोगों का साथ लेंगे। बस यहीं आप सरकार और उन लोगों के लिए महाविरोधी साबित हो जाएंगे। नतीजा ये होगा कि आप अलग-अलग संबोधनों से जाने जाएंगे।

Friday, 15 September 2017

बकरीद की छुट्टी

बकरीद की छुट्टी
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तुम्हें उदास नहीं देखना चाहता
पर क्या करूं इत्तिला तो करनी ही है

मन में विचार कौंध रहे हैं
पर काबू नहीं कर पा रहा

अभी अभी मेल पर तार मिला है
पर लिखा पढ़कर भी सच नहीं मान पा रहा

दफ्तर की डेस्क पर हूं, मन उदास हो चूका है
पर संयम बनाये रखने की कवायद जारी है

कंप्यूटर के कीबोर्ड पर हाथ फर्राटा भरते हैं
पर मोबाइल पर आज उंगलियां जड़ हैं

जनता हूं जज़्बातों की जंग जीत नहीं पाउंगा
पर तुम्हें लिख रहा हूं ये खत, उदास मत होना

बकरीद की छुट्टी कैंसिल हो गई है
पर वादा रहा जल्दी आऊंगा।।

Sunday, 10 September 2017

मलाला के अनुरोध पर रोहिंग्या संघर्ष पर विराम

नोबल पुरस्कार विजेता मलाला युसुफजई 

म्यांमार सेना और अराकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी (एआरएसए) के बीच करीब 15 दिनों से चल रही जंग शनिवार को खत्म करने का ऐलान किया गया है। रोहिंग्या मुसलमानों के हक के लिए लड़ने वाली साल्वेशन आर्मी ने  एक महीने के लिए एकतरफा संघर्ष विराम की घोषणा की है। 

माना जा रहा है कि नोबल पुरस्कार विजेता मलाला युसुफजई के निर्दोष लोगों की हत्याओं पर दुख जताने और हिंसा थमने के अनुरोध पर रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी के प्रमुख अताउल्लाह अबू अम्मार जुनूनी ने ये कदम उठाया है। वहीं, कुछ जानकारों का मानना है कि आतंकी संगठन ने म्यांमार के हिंसाग्रस्त प्रांत रखाइन में सहायता समूहों द्वारा रोहिंग्या मुसलमानों को मदद पहुंचाने के लिए यह कदम उठाया है। 

पाकिस्तान की मलाला यूसुफजई ने म्यांमार के रखाइन प्रांत में रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ जारी हिंसा पर 4 सितंबर को बयान दिया था। इसमें मलाला ने कहा था कि जब भी वह म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों की पीड़ा की खबरें देखती हैं तो वह अंदर से दुखी हो जाती हैं। मलाला ने अपने बयान में आगे लिखा, ‘हिंसा थमनी चाहिए। मैंने म्यांमार के सुरक्षाबलों द्वारा मारे गए छोटे बच्चे की एक तस्वीर देखी। इन बच्चों ने किसी पर हमला नहीं किया था लेकिन इन्हें बेघर कर दिया गया। अगर इनका घर म्यांमार नहीं है तो ये पीढ़ियों से कहां रह रहे थे?’


दुनिया में सबसे ज्यादा जुल्म रोहिंग्या पर
कहा जाता है कि दुनिया में रोहिंग्या मुसलमान ऐसा अल्पसंख्यक समुदाय है जिस पर सबसे ज़्यादा ज़ुल्म हो रहा है। इसका ताजा उदाहरण म्यांमार हिंसा है। म्यांमार की बहुसंख्यक आबादी बौद्ध है। म्यांमार में एक अनुमान के मुताबिक़ 10 लाख रोहिंग्या मुसलमान हैं। इन मुसलमानों के बारे में कहा जाता है कि वे मुख्य रूप से अवैध बांग्लादेशी प्रवासी हैं। सरकार ने इन्हें नागरिकता देने से इनकार कर दिया है। हालांकि ये म्यामांर में पीढ़ियों से रह रहे हैं। 

बौद्ध और रोहिंग्या के बीच लंबे समय से हक और अधिकारों के लिए खूनी संघर्ष चल रहा है। रोहिंग्या मुसलमानों को व्यापक पैमाने पर भेदभाव और दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ रहा है। यही वजह है कि रखाइन प्रांत में 2012 से सांप्रदायिक हिंसा जारी है। सयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक इस हिंसा में बड़ी संख्या में लोगों की जानें गई हैं और एक लाख से ज्यादा लोग बेघर हो चुके हैं। बड़ी संख्या में रोहिंग्या मुसलमान आज भी जर्जर कैंपो में रह रहे हैं। 
हिंसाग्रस्त रखाइन प्रांत से घर छोड़कर जाते रोहिंग्या मुसलमान

म्यांमार सरकार से हक मांगने पर मिली गोली 
म्यांमार सरकार ने रोहिंग्या मुसलमानों पर कई तरह के प्रतिबंध लगा रखे हैं। ऐसे प्रतिबंधों में आवागमन, मेडिकल सुविधा, शिक्षा और अन्य सुविधाएं शामिल हैं। रोहिंग्या मुसलमानों के अधिकारों के लिए लड़ रहे रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी (एआरएसए) संगठन को म्यांमार सरकार आतंकवादी मानती है। ऐसे में म्यांमार सेना और रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी के बीच लड़ाई छिड़ी हुई है। 

25 अगस्त को रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी के सशस्त्र लड़ाकों ने तीस पुलिस चौकियों और एक सैन्य ठिकाने पर हमला कर दिया। इसके बाद म्यामांर की सेना ने रोहिंग्या आर्मी के खिलाफ अभियान छेड़ दिया। इसका परिणाम ये हुआ कि रखाइन प्रांत में सेना ने मुसलमानों को बेघर करना शुरू कर दिया। महिलाओं और मासूमों के साथ ज्यादती की गई। इसका फायदा उठाकर बौद्ध रोहिंग्या के घरों में आग लगा रहे हैं। 

करीब तीन लाख रोहिंग्या मुसलमानों पर बर्बरता करने के आरोप म्यांमार सेना पर लगाए गए हैं। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक हिंसाग्रस्त रखाइन प्रांत से किसी तरह बचकर रोहिंग्या मुसलमान भागकर पड़ोसी देश बांग्लादेश में शरण ले रहे हैं। रखाइन के विभिन्न हिस्सों में भी करीब तीस हजार रोहिंग्या बेघर हो गए हैं। 

रखाइन प्रांत में मार्च करते म्यांमार सेना के जवान

कौन है आराकान रोहिंग्या रक्षा सेना
आराकान रोहिंग्या रक्षा सेना म्यांमार के उत्तरी सूबे रख़ाइन में सक्रिय एक सशस्त्र संगठन है। ये संगठन रोहिंग्या मुस्लिम अल्पसंख्यकों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय संकट समूह (आईसीजी) के मुताबिक इस संगठन की अगुवाई अताउल्लाह अबू अम्मार जुनूनी कर रहा है। अताउल्लाह वीडियो संदेशों के जरिए रखाइन में अपने संगठन की गतिविधियों के बारे में बताता रहता है। 

मार्च में अताउल्लाह ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को दिए अपने इंटरव्यू में कहा था कि रोहिंग्या मुसलमानों के लिए उनकी लड़ाई तब तक जारी रहेगी जब तक म्यांमार की नेता आंग सान सू की उन्हें बचाने के लिए कोई कदम नहीं उठाती हैं। अताउल्लाह विदेशी इस्लामी आतंकियों से संबंध रखने के आरोपों से इनकार करते हैं। अताउल्लाह का कहना है कि उनकी लड़ाई देश के बौद्ध बहुमत के दमन के खिलाफ है।

उन्होंने कहा, अगर हमें हमारे हक नहीं मिलते और अगर इस लड़ाई में लाखों रोहिंग्या मुसलमानों की जान चली जाती है तो हम मरते दम तक तानाशाह सैनिक सरकार के खिलाफ लड़ते रहेंगे। हम रात के वक्त रोशनी नहीं जला सकते। हम दिन के वक्त एक जगह से दूसरे जगह नहीं जा सकते। हर जगह नाकाबंदी है। जिंदगी जीने का ये तो कोई तरीका नहीं है।"

स्रोत: डिफरेंट वेबसाइट्स

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